
पॉलिटिकल पार्टी
यशोदा श्रीवास्तव
महराजगंज. लोकसभा चुनाव में पूर्वांचल की दो सीटों पर विपक्ष का चाहे जो उम्मीदवार होगा वह विधानसभा का हारा हुआ प्रत्याशी ही होगा। इन दोनों ही सीटों पर साझा उम्मीदवार के जो चेहरे सामने आ रहे हैं वे सब के सब विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमा चुके हैं। कुछ तो कई कई बार विधानसभा का चुनाव ही हारे हैं। लोकसभा की ये दोनों सीटे हैं महराजगंज और डुमरियागंज। दोनों सीटें अगल बगल ही है और इनका फैलाव नेपाल सीमा तक है।
महराजगंज और डुमरियागंज संसदीय सीटों पर अभी भाजपा का कब्जा है। यहां से क्रमशः पंकज चैधरी तथा जगदंबिका पाल सांसद हैं। पाल पिछली बार डुमरियागंज सीट से कांग्रेस के सांसद थे और दूसरी बार इसी सीट से पाला बदलकर भाजपा से भी सांसद बन गए जबकि पंकज चैधरी अपनी महराजगंज सीट से पांच बार से भाजपा के टिकट पर ही सांसद हैं। सांसद चैधरी 1991में पहली बार सांसद चुने गए थे उसके बाद सिर्फ दो बार ही हारे हैं।
2019 में भाजपा को हराने के लिए विपक्ष साझा रणनीति पर विचार कर रहा है। यहां गौर करने की बात यह है कि पीएम मोदी सहित भाजपा का एक एक सांसद यूपी सू चुनाव की श्री गणेश कर चुके हैं। वहीं भाजपा को सत्ता से बाहर करने को आतुर विपक्ष का अभी गठबंधन ही तय नहीं है। हाल यह है कि गठबंधन में अभी कांग्रेस का रूख स्पष्ट नहीं है बावजूद इसके सपा बसपा में ही सीेटों का बंटवारा तय नहीं हो पा रहा है। सपा और बसपा की ओर से हर रोज अलग अलग बयान आ रहे हैं। वैसे अंदरखाने की खबर ये है कि भाजपा भी बसपा को अपने पाले में खींचने की कोशिश में हैं। हालाकि एससी एसटी एक्ट के जरिए भाजपा ने दलित वोटों को अपनी ओर आर्कषित करने का भी दांव चल दिया है।
अब अगर गठबंधन में कांग्रेस शामिल होती है और इसे ही दोनों सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करने का अवसर हासिल होता है तो इसके पास विधानसभा चुनाव में हारे हुए प्रत्याशियों पर दांव लगाने के सिवा कोई और चारा नहीं है। बात अगर महराजगंज संसदीय सीट की करें तो कांग्रेस की ओर से लोकसभा चुनाव के लिए दो चेहरे सामने आ रहे हैं।
पार्टी अल्पसंख्यक पर दांव लगाना चाहेगी तो तलत अजीज का नाम लिया जा रहा है और बैकवर्ड पर दांव लगाई तो विरेंद्र चैधरी का नाम चर्चा में हैं। विरेंद्र चैधरी लगातार पांच बार विधानसभा का चुनाव हारे हैं। बावजूद इसके उनके जनधार को इग्नोर नहीे किया जा सकता। कुर्मी बाहुल्य इस संसदीय सीट पर कुर्मी वोटरों में उनकी अच्छी पकड़ है लेकिन भाजपा उम्मीदवार के भी कुर्मी होने का नुकशान इन्हें उठाना पड़ सकता है। वहीं तलत अजीज एक बार बसपा के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ी जरूर हैं लेकिन तब वे वोटों के मामले में अन्य उम्मीदवारों से बहुत पीछे रह गई थी।
विधानसभा का चुनाव वे भी दो बार लड़ी हैं और हारी है। 2017 के विधानसभा चुनाव में जिले के पनियरा विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में मैदान मंे थीं लेकिन सम्मानजनक वोट हासिल कर चुनाव हार गईं थी। इस सीट पर कांग्रेस को यदि मौका मिलता है तो फिलहाल ये दो चेहरों के अलावा अन्य कोई चेहरा अभी सामने नहीं है और ये देानों ही विधानसभा का चुनाव हार चुके हैं।
अब यह सीट यदि बसपा के हिस्से में जाती हो तो बस एक ही नाम है विधानपरिषद के पूर्व सभापति गणेश शंकर पांडेय का। वे भी पनियरा विधानसभा सीट से पिछला चुनाव हार चुके हैं। सपा यदि इस सीट से चुनाव लड़ती है तो पूर्व सांसद कुंअर अखिलेश सिंह यदि टिकट पाते हैं तो वे विधायक रह चुके अपनी सीट नौतनवा से पिछले कई बार से विधानसभा नहीं लड़े हैं। लेकिन चर्चा जोरों पर है कि सपा को यदि मौका मिला तो इस बार वह सिसवा विधानसभा क्षेत्र से कई बार विधायक व मंत्री रह चुके शिवेंद्र सिंह पर दांव लगाएगी। शिवेंद्र सिंह भी पिछला विधानसभा चुनाव सपा के टिकट पर अपनी परंपरागत सीट सिसवा से हार चुके हैं।
अब चर्चा करते हैं डुमरियागंज संसदीय सीट की। यहां की भी स्थित महराजगंज संसदीय सटि जैसी ही है। गठबंधन से सीट किसके खाते में जाती है, यह अभी तय नहीं है। लेकिन बसपा सपा और कांग्रेस तीनों ही दल जोर शोर से तैयारी में लग गए हैं। पूर्व सांसद मो मुकीम पिछले दिनों राहुल गांधी से मिलकर अपने चुनाव लड़ने के कयास को मजबूती दे रहे हैं तो पूर्व विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय हाल ही पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह से मिलकर अपनी दावेदारी पक्की होने का दावा कर रहे हैं वहीं बसपा कई महीने पहले ही गोरखपुर जिले के पिपराइच विधानसभा सीट से चुनाव हार चुके आफताब आलम को संसदीय क्षेत्र का प्रभारी घोषित कर मैदान में उतारने का संकेत दे दिया है।
फिलहाल गठबंधन में सीट किसके हिस्से में आती है अभी तय नहीं है लेकिन जिसके भी खाते में आती है, उसका उम्मीदवार वहीं होगा जो विधानसभा चुनाव हार चुका है। बसपा के दावेदर आफताब भी चुनाव हारे हैं तो सपा के माता प्रसाद पांडेय अपनी परंपरागत सीट इटवा से पिछला ही विधानसभा चुनाव हारे हैं। 2017 में सपा कागे्रस के समझौते से इटवा की सीट सपा के खाते में थी इसलिए मो मुकीम चुनाव लड़ने से वंचित रह गए थे लेकिन इसके पहले यानी 2012 के विधानसभा चुनाव वे भी कांग्रेस के टिकट से लड़कर हार चुके हैं।
Published on:
07 Aug 2018 01:29 pm
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