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नर्मदा परिक्रमाः देख नहीं पाते, हाथ में लाठी लेकर कर रहे हैं 3500 किमी की पैदल यात्रा

narmada parikrama- नर्मदा परिक्रमा के लिए लाठी लेकर अकेले ही निकल पड़े इंदौर के नीलेश धनकर...। आंखें नहीं तो मन की आंखों से देख लेते हैं रास्ता...।

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मंडला

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Manish Geete

Jan 25, 2023

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नेत्रहीन नीलेश धनकर 3500 किमी की नर्मदा परिक्रमा कर रहे हैं।

निवास (मंडल)। इंदौर के नीलेश धनकर ऐसे व्यक्ति हैं, जिनकी आंखें नहीं हैं। लेकिन, उनकी भक्ति ऐसी है कि वे 3500 किलोमीटर की नर्मदा परिक्रमा पर निकल पड़े हैं। 22 दिन की यात्रा पूरी हो गई है, अभी 6 से 7 माह का सफर बाकी है। नर्मदा परिक्रमा के कच्चे-पक्के दुर्गम रास्ते पर निकले निलेश कहते हैं कि मां नर्मदा दिखा रही है रास्ता तो आगे बढ़ते जा रहे हैं हम।

नर्मदा परिक्रमावासी पथ पर एक से बढ़कर एक तपस्वी संत महात्मा परिक्रमा करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। उन्हीं में से एक संत हैं इंदौर मूसाखेड़ी निवासी 37 वर्षीय नीलेश धनगर जिनकी विशेषता है कि वे जन्म से ही नेत्रहीन होने के बाद भी अकेले ही नर्मदा परिक्रमा पर निकल गए हैं। नर्मदा की इस परिक्रमा में उनकी संगी-साथी उनकी लाठी है जो उन्हें कच्चे-पक्के रास्तों पर चलने में मदद कर रही है।

नर्मदा के बुधनी तट से शुरू हुई परिक्रमा में नीलेश अब तक 22 दिन की यात्रा पूरी कर चुके हैं। लाठी के सहारे नर्मदा परिक्रमा कर रहे नीलेश ने बताया कि वह राजनीति विज्ञान से एमए हैं, कम्प्यूटर कोर्स भी किया है। टाकिंग साफ्टवेयर की मदद से वह मोबाइल भी चलाते हैं। नीलेश बताते हैं कि परिवार में सात सदस्य हैं। मन में नर्मदा की परिक्रमा करने की इच्छा थी लेकिन नेत्रहीनता के कारण साहस नहीं जुटा पा रहे थे कि यात्रा कैंसे होगी। इसलिए पहले इंदौर से देवास, उज्जैन, ओंकारेश्वर व खंडवा की यात्रा की। जब यह यात्राएं सफलता से पूरी हो गईं तो उत्साह बढ़ा कि अब नर्मदा परिक्रमा की जा सकती है।

इसके बाद दो जनवरी 2023 को बुधनी घाट से नर्मदा की परिक्रमा शुरू की है. नीलेश महाराज ने बरेला मनेरी होते हुए मंडला जिले की सीमा में प्रवेश किया। जहां दंडी महाराज आश्रम ग्राम भलवारा में अल्पप्रवास करते हुए दोपहर का भोजन ग्रहण किया और आगे बढ़े। नीलेश महाराज बताते हैं कि नर्मदाजी की जैसी महिमा वह अन्य पथिकों से सुनते थे कि मां नर्मदा अपने भक्त को कोई कष्ट नहीं होने देती और मदद करती हैं यह अब अनुभव हो रहा है।

नेत्रहीन होने से वह भोजन नहीं बना पाते लेकिन अब तक एक भी दिन ऐसा नहीं रहा जब उन्हें भूखा सोने की नौबत बनी हो। यात्रा में हर जगह उन्हें भोजन-प्रसादी मिल जाती है, नर्मदा भक्त रुकने की व्यवस्था कर देते हैं, रास्ता बता देते है।

लाठी बनी सहारा

परिक्रमावासी का कहना है कि यात्रा में लाठी उन्हें बता देती है कि रास्ता कच्चा है या पक्का, जब लाठी कच्ची जगह में पड़ती है तो आवाज कम आती है तो समझ जाते हैं कि रास्ता कच्चा है और जब आवाज अधिक होती है तो पता चलता है कि पक्की सड़क है। उन्हें परिक्रमा में करीब 36 सौ किमी की यात्रा करना हैं। जिसे पूरा होने में छह से सात माह का समय लग सकता है।

नीलेश बताते हैं कि मां नर्मदा हर संकट को हरने वाली हैं इनकी कृपा का अनुभव करना हो तो एक बार परिक्रमा करके देख लें। मेरी परिक्रमा का उद्देश्य मां नर्मदा की कृपा पाना तो है ही साथ ही लोगों की परिक्रमा के प्रति प्रेरित करना भी है कि जब मुझ जैसा नेत्रहीन भक्त माई की परिक्रमा कर सकता है तो सामान्य व्यक्ति को बड़ी ही आसानी से परिक्रमा कर सकता है। नर्मदा भक्तों को पेड़ पौधे काटना की नहीं चाहिए यदि काटने की आवश्यकता पड़ भी जाए तो एक पेड़ के बदले कम से कम 4 पेड़ लगाना ही चाहिए।

नीलेश महाराज की सेवा करने का सौभाग्य मिला, ये बचपन से ही नेत्रहीन हैं फिर भी मां नर्मदा की कृपा से परिक्रमा पथ पर आगे बढ़ रहे हैं। मां नर्मदा से विनती है कि इनकी परिक्रमा सफल हो और लोकहित के काम आये।

राजीव जायसवाल, दंडवती आश्रम भलवारा निवास

मां नर्मदा की परिक्रमा पर निकले नेत्रहीन नीलेश महाराज सामान्य परिक्रमावासी की तरह पैदल परिक्रमा कर रहे हैं। केवल लाठी के सहारे ऊंचे नीचे रास्तों पर बढ़ते जा रहे हैं। लगता है जैसे लाठी ही इनकी आंखों का काम कर रही है।

धर्मेंद्र सिंह ठाकुर, प्रदेश महासचिव हिंदू सेवा परिषद्

बहुत से संतों का सानिध्य मिला लेकिन इस तरह के एकमात्र संत हैं जो नेत्रहीन होने के बाद भी परिक्रमा पर निकल पड़े हैं।

रोहित चौकसे, स्थानीय निवासी