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गांव में नहीं मिल रहा काम, मजदूरी की तलाश में फिर महानगरों की ओर मजदूर

सरकारी दावे फेल, नहीं रुक रहा पलायन

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गांव में नहीं मिल रहा काम, मजदूरी की तलाश में फिर महानगरों की ओर मजदूर

गांव में नहीं मिल रहा काम, मजदूरी की तलाश में फिर महानगरों की ओर मजदूर

नैनपुर. अपने परिवार के भरण-पोषण का बोझ अपने कंधे पर लादे मजदूर प्रवासी एक बार फिर दूसरे राज्य की ओर रूख करने लगे हैं। सैकड़ों मजदूर विकास खंड नैनपुर से पहले ही पलायन कर चुके हैं। शेष मजदूर अब त्योहार, मड़ई मेला कर महानगरों की खाक छानने और अपने परिवार को पालने जा रहे हैं। नैनपुर बस स्टेंड और रेलवे स्टेशन में रोजाना बड़ी संख्या में मजदूर बस व ट्रेनों का इंतजार करते देखे जा रहे हैं।

एक तरफ तो सरकारी नुमाइंदे गांव-गांव में रोजगार और हर मजदूर को काम देने का दावा कर रहे है। लेकिन उनके दावों और सरकारी दलीलों में कितना दम है यह रोज पलायन करने वाले ग्रामीणों की भीड़ को देखकर लगाया जा सकता है। गांव में काम की कमी और परिवार को पालने की उनकी मजबूरी उनको अपना क्षेत्र से अलग होने के लिए मजबूर करता है। कुछ मजदूरो का तो कहना है कि जंग जीता जा सकता है पर भूख से नहीं। परिवार के भरण-पोषण उनकी पढ़ाई लिखाई और स्वस्थ्य के लिए उन्हे बाहर जाना ही होगा। नहीं तो यहां खाने के लाले पड़ जाएंगे। पलायन कर रहे मजदूरों का आरोप है कि क्षेत्र में मनरेगा में उन्हीं लोगो को काम मिलता है जो पहले से ही ठेकेदार के संपर्क में हैं या फिर जो अपनी मेहनत की कमाई का कुछ हिस्सा लेते देते हैं। वही कुछ मजदूर बताते हैं कि उन्हें मनरेगा से क्या मतलब है। सीमित काम के कारण हमारे परिवार का भरण पोषण सम्भव नहीं हो पा रहा है। लिहाजा बड़े शहरों में बड़ा काम और लंबे समय का काम हमे ंमददगार भी होता है। शहरों में उद्योग से जुड़े काम के साथ भवन निर्माण जैसे बड़े कार्यो में मजदूरों को रुपया भी अच्छा मिल जाता है। यहां टाइल्स लगाने, विद्युत फिटिंग सहित अन्य कार्य का काम बहुत कम मात्रा में होता है। यहां उनके लिए कोई रोजगार नही दिख रहा है। अब प्रदेशों में काम शुरू हो गया है। ठेकेदार और मालिक का फोन आ रहा है। ठेकेदार और मालिकों के द्वारा वापस आने के लिए पैसे भी खाते में डालें जा रहे हैं। महीनों से घरों में बैठे हैं। घर चलाना मुश्किल हो रहा है। इसलिए बाहर जाना पड़ रहा है।

ठेकेदारों का बोलबाला

जनपद पंचायत नैनपुर में आलम यह है कि संपूर्ण 74 पंचायतों में जनप्रतिनिधि अब खुद ठेकेदारी कर रहे हैं। जो निर्धारित कार्य को बाहर के ठेकेदारों को मोटी रकम लेकर बाहर के मजदूरों व मशीनों के माध्यम से काम कराकर पंचायत के मजदूरों का शोषण व हक छीन रहे हैं। लोकल मजदूरों से कार्य कराने में कहीं निर्माण कार्य की गुणवत्ता की पोल न खुल जाए की डर से उनसे काम कराने से कतराते हैं। इन हालातों में स्थानीय जरूरत मंद मजदूर काम के अभाव में पलायन को ही अपना धर्म मानकर देश क्षेत्र छोडकर अन्यत्र पलायन करने मजबूर हो जाते है।