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VIDEO- यहां आज भी जीवित है शैला नृत्य की परंपरा, जानिए कैसे मनाया जाता है यह महोत्सव

झोला ग्राम में मनाया गया रीना शैला महोत्सव, आदिवासी लोकनृत्य में युवाओं ने लिया हिस्सा

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मंडला

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Manish Geete

Jan 04, 2022

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मंडला। प्राचीन काल से चला आ रहा आदिवासियों का रीना शैला महोत्सव आज भी आदिवासी अंचल में मनाया जाता है। भाई चारे और सद्भाव का प्रतीक यह महोत्सव आदिवासी अंचल में उत्साह से मनाया जाता है। जिले के मवई तहसील के अंतर्गत ग्राम पंचायत मालूमझोला रीना शैला महोत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। इसके अंतर्गत अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस वर्ष भी नववर्ष के पहले सप्ताह में कार्यक्रम आयोजित किया गया।

स्थानीय कलाकारों ने कर्मा, शैला, रीना नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति दी। बताया गया कि विलुप्त होते समृद्ध आदिवासी संस्कृति को जीवंत बनाए रखने के लिए यह कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिसमें स्कूल कॉलेज के छात्रों एवं गांव के लोगों ने प्रस्तुति दी। कार्यक्रम में टटमा, चीतानचना, मंगली, मालूमझोला आदिगांव से आदिवासी समाज के लोग उपस्थित रहे।

क्या है शैला नृत्य

सैला (शैला) शुद्धतः जनजातीय नृत्य है। यह आपसी प्रेम एवं भाई-चारे का प्रतीक माना जाता है। ‘ सैला ' का अर्थ' शैल ' या' डण्डा ' होता है। शैल शिखरों पर रहने वाले आदिवासियों के कारण इसका नाम शैला (सैला) पड़ गया। यह नृत्य दशहरे में आरम्भ होकर सम्पूर्ण शरद ऋतु तक चलता रहता है। इस नृत्य का आयोजन अपने आदिदेव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। सैला नृत्य को डण्डा नाच भी कहा जाता है। इस नृत्य में नाचने वाले आदिवासी सादी वेशभूषा में हाथों में डण्डा लेकर और पैरों में घुंघरू बांधकर गोल घेरा बनाकर नाचते हैं। इस दौरान दोहे भी पढ़े जाते हैं। इस नृत्य का प्राचीन नाम सैला-रीना है।