
ताकि वन अधिकार से वंचित ना हो आदिवासी
नारायणगंज. वन में रहने वाले आदिवासी और अन्य परंपरागत वन में निवास करने वाले वन निवासियों के अधिकारों को बचाने के लिए समस्त सामाजिक संगठन एकजूट हो गए हैं। जिसको लेकर निवास विधायक डॉ अशोक मर्सकोले की अनुपस्थिति में विधायक प्रतिनिधि कमलेश तिलगाम को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा गया। जिसमेंं बताया गया कि देश के करोड़ों लोगों को अधिकार अभी खतरे में है। दो विषयों को लेकर प्रदेश सरकार से राय मांगी गई है। जिसमें अपील की गई है कि सरकार गरीब आदिवासी और परंपरागत वन में निवास करने वालों के हक के लिए लड़े हैं उनको अपनी जमीन और आजीविका से वंचित करने के प्रयास में सरकार भी शामिल ना हो। बताया गया कि आगामी 24 जुलाई को उच्चतम न्यायालय सुप्रीम कोर्ट में वन अधिकार कानून 2006 के बारे में सुनवाई होने वाली है पिछले कुछ वर्षों से प्रदेश सरकार और केंद्र की सरकार के वकील दोनों इस केस को मुखर रूप से कोर्ट में लोगों के पक्ष उठा नहीं सके हैं। जिसकी वजह से 13 फरवरी 2019 को कोर्ट ने आदेश दिया था कि लाखों आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन में निवास करने वाली जनजाति परिवार मतलब जिनके वन अधिकार के दावे निरस्त हुए हैं उनको बेदखल किया जाए। पूरे देश में जन आंदोलन होने के बाद केंद्र सरकार को कोर्ट से निवेदन करना पड़ा कि इस आदेश को स्थगित किया जाए। आगामी 24 जुलाई 2019 को फिर से सुनवाई होने वाली है । जिसके लिए समाज सेवियों ने अपील की है कि इस बार कम से कम प्रदेश सरकार की तरफ से काबिल वकील कोर्ट में मजबूती से लोगों के अधिकारों को बचाने और उनकी बेदखली रुकवाए। क्योंकि बेदखली का कोई प्रावधान वन अधिकार कानून में है ही नहीं और अदालतों में यह मुद्दा भी नहीं है। लोगों को अधिकार देने के बजाय अगर उनको अपनी जमीन और परंपरागत वन अधिकारों से वंचित किया जाए। यह लोगों के साथ ऐतिहासिक अन्याय को दोहराना होगा जो कभी अंग्रेजी सरकार ने किया था। अगर ऐसा किया गया तो इसके लिए केंद्रीय और राज्य सरकार ही जिम्मेदार होंगे। 7 मार्च 2019 को केंद्र सरकार ने सभी राज्य सरकारों को एक पत्र द्वारा भारतीय कानून में संशोधन करने के लिए प्रस्ताव भेजा है। 7 अगस्त 2019 तक राज्य सरकारों का जवाब देने की लिए समय दिया गया है। प्रस्ताव कानून बन जाता है वन विभाग को अधिकार दिया जाएगा कि वह गोली चला सकेंगे और अगर वे यह साबित कर देंगे की गोली कानून के अनुसार चलाई गई है तो उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होगी। धारा 66 पैरा 2 जैसे अगर किसी के पास कुल्हाड़ी दुराती हसिया या अन्य पारंपरिक औजार देखे गए तो उन्हें रोकने के लिए गोली मार सकते हैं। अगर वन विभाग किसी भी आदिवासी या अन्य व्यक्ति पर आरोप लगाएगा की उसने अपराध किया है तो यह उस व्यक्ति को साबित करना होगा कि वह निर्दोश है अगर वन विभाग का रेंजर या अन्य अधिकारी एनकेएन प्रकरण यह साबित कर देंगे कि उसने अपराध को स्वीकार किया है तो इसी के आधार पर व दोषी माना जाएगा 64 ब किसी भी क्षेत्र क्षेत्र को आरक्षित वन या कंजर्वेशन रिजर्व को घोषित किया जा सकता है। तब लोगों के जितने भी उस वन में हक है जैसे की खेती करना, सुखी पत्तियां लेना, जलाऊ लकड़ीयां लेना, पशुओं के लिए चारा एवं लघु वनोपज लेना आदि उन सारे पारंपरिक हकों को वन विभाग कुछ पैसों का लालच देकर खत्म कर सकते हैं । गाय भैंस भेड़ बकरियों एवं अन्य पशुओं को जंगल में ले जाना लोग आग लगा रहे हैं यह कहकर वन विभाग कभी भी प्रतिबंधित कर सकता है। अगर यह प्रस्ताव कानून बन जाता है तो आदिवासियों और अन्य परंपरागत वनवासियों के ऊपर वन विभाग की पूरी तानाशाही चलेगी। वन अधिकार कानून एवं लोगों की जीने के मूल अधिकार पर सीधा हमला है। राज्य सरकार की ओर से इसके खिलाफ कठोर जवाब जाना चाहिए कि ऐसे कोई कानून की ना जरूरत है ना ही जायज है। वन अधिकार कानून 2006 का ठीक से पालन कराया जाए। वन विभाग के अधिकारी लोगों के अधिकारों को खत्म ना करें इसके लिए नीतिगत कानूनी कदम उठाने की जरूरत है। इस आशा में है कि इन मुद्दों पर जल्द से जल्द करेंगे। ज्ञापन सौंपने के दौरान सुद्धे सिंह तेकाम, कमलेश तेकाम, सुदेश परते सदस्य जिला पंचायत, इंद्रजीत भंडारी, मनोज परते, जय परतेती, देवेंद्र मरावी, मिथिलेश मर्सकोले, राम सिंह पन्द्रों, मोहन मार्कोए, जगत पन्द्रों, आशीष मरावी, विधान मरावी, संदीप मरकाम सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों के सदस्य व राजनीतिक दलों के सदस्य उपस्थित रहे।
Published on:
13 Jul 2019 11:48 am
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