
संग्रहालय में सुरक्षित है वर्षों का इतिहास, देखने के लिए देश-विदेश से आते हैं सैलानी
मंडला. जिले व आसपास क्षेत्र में मिली धरोहरों को आज भी जिले का एक मात्र संग्रहालय संजो कर रखा है। जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में देशी एवं विदेशी सैलानी पहुंचते हैं। यहां रखे हजारों साल पुराने शिलालेख एवं फॉसिल्स अपने गौरवशाली इतिहास को प्रदर्शित करते हैं। लेकिन क्षेत्रीय लोगों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। दरअसल निर्धारित किराया काफी बढ़ा दिया गया है। 15वर्ष से ऊपर बड़े बच्चों के लिए भी 20 रुपए किराया लग रहा है। जिसमें क्षेत्रीय व विद्यार्थी भी शामिल हैं। नागरिकों का कहना है कि एतिहासिक धरोहरें बच्चों के शिक्षा में काफी मददगार साबित हो सकती है। जिसके लिए क्षेत्रीय विद्यार्थियों को भी यहां भ्रमण में छूट दी जानी चाहिए।
उत्कृष्ट विद्यालय के शिक्षक राजेश क्षत्रीय का कहना है कि स्कूल के बच्चों को समय-समय पर संग्रहालय का भ्रमण कराया जाता है। जिसे देख कर हमारी पूरानी संस्कृति का पता चलता है तो छात्र-छात्राआें को नया सीखने को भी मिल रहा है। गौरतलब है कि जिला पंचायत कार्यालय के सामने सिविल लाईन में स्थित पुरातत्व संग्रहालय की नींव तत्कालीन जिला सांख्यिकी अधिकारी डॉ धर्मेन्द्र प्रसाद एवं पुरातत्व संघ के सदस्यों ने वर्ष 1976 में रखी गई थी। जिसे 1979 में मप्र शासन ने अधिग्रहित कर लिया। जिसे निरंतर विकसित किया जा रहा है। हाल ही में भवन का जीर्णोद्वार किया गया है। जिसके बाद संग्रहालय की रौनक बढ़ गई है वहीं सामग्रियां भी पहले से अधिक सुरक्षित हैं। जानकारी के अनुसार संग्रहालय में 630 पुरावशेष संग्रहित करके रखे गए हैं।
जिनमें पाषाण प्रतिमाओं के अतिरिक्त विविधि प्रकार के जीवाश्म, कल्चुरि नरेश विजयसिंह देव का ताम्रपत्र, हस्तलिखित ग्रंथ, पिपरहवा (बिहार) से प्राप्त बौद्धकालीन चांवल, आदिवासी, संस्कृति उपकरण, आभूषण, आयुध, धातु की प्रतिमाएं, तलवारें इत्यादि विविधता पूर्ण रोचक संकलन है।
संग्रहालय का मुख्य आकर्षण जीवाश्म
दस करोड़ वर्ष प्राचीन पादप जीवाश्म, डायनासौर का अस्थि जीवाश्म, शंख जीवाश्म नारियल का जीवाश्म, मछली का जीवाश्म आदि संग्रहालय में रखे हुए हैं। जो आकर्षण का केन्द्र हैं। जीवाश्म संग्रह की दृष्टि से यह प्रदेश का प्रथम संग्रहालय है। जीवाश्मों से ज्ञात होता है कि करोड़ों वर्ष पूर्व यह भू-भाग समुद्र तट का अंश रहा होगा और करोड़ों वर्ष की अश्मीकरण क्रिया के फलस्वरूप वृक्ष एवं जीव जंतु पाषाणों में परिवर्तित हो गए। जीवाश्म जिले के पारापानी, समनापुर, घुघवा, सिलठार, देवरी खुर्द, चरगांव, बरबसपुर तथा शंख जीवाश्म पालासुंदर से संग्रहित किए गए है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम की 50वीं वर्षगांठ पर निर्मित एक दीर्धा, जिसमें जिले के स्वतंत्रता संग्राम के अभिलेख संकलित कर प्रदर्शित किए गए है। जिसमें स्वतंत्रता संग्राम की रोचक जानकारी प्राप्त होती है। संग्रहालय का उद्देश्य अपनी अमूल्य धरोहरों को संरक्षित रखते हुए अपनी स्वर्णिम संस्कृति को आगामी पीढ़ी तक पहुंचाना भी है। जिसका प्रचार-प्रसार का अभाव भी है जिससे लोेगों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।
Published on:
18 May 2023 04:27 pm
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