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जो दुनिया में सुनाई दे उसे खामोशी, जो आंखों में दिखाई दे उसे कहते है तूफान…

- नाहर सैयद दरगाह परिसर में आयोजित हुआ मुशायरा व कवि सम्मेलन

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kavi sammelan

मंदसौर.
शहर के नाहर सैयद दरगाह परिसर में नपा परिषद द्वारा तीन दिवसीय राष्ट्रीय एकता नाहर सैयद मेला के अंतर्गत बुधवार की रात्रि में मुशायरा व कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें कई ख्यात शायरों बेहतरीन शायरी से हजारों श्रोताओं का मन मोह लिया। दर्द, प्रेम, देशभक्ति जैसे कई विषयों पर शायरों ने कलाम व गजल पढ़ी। इस मुशायरा व कवि सम्मेलन में अंतराष्ट्रीय शायर डॉ. राहत इंदौरी, मंजर भोपाली, साहिस्तासना लखनऊ, अजुम बारबांकी उत्तरप्रदेश, चांदनी शबनम कानपुर उतरप्रदेश, डॉ जाहिद अमरावती महाराष्ट्र, इस्माईल नजर देवास, अलाउद्दीन अंबर मुम्बई, संजय खत्री इंदौर, चांद अंजुम ने अपनी शायरी प्रस्तुत की। इस कार्यक्रम के अतिथि छोटे मियांजी वकीलुद्दीन सरकार, हजरत सुफी तौफिक बाबा बांसवाड़ा, नपाध्यक्ष प्रहलाद बंधवार, मेला सभापति नरेंद्र बारिया, अनिल कियावत, मोहम्मद हनीफ शेख सहित कई लोग उपस्थित थे।


प्रमुख शायरो ने यह पढ़े कलाम

- हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते है, मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते है, जो दुनिया में सुनाई दे उसे कहते है खामोशी, जो आंखों में दिखाई दे उसे तूफान कहते है।
- कबीर सत्संग, भजन-कीर्तन, कहीं पर नाथ- कव्वाली। यहां के लोग मिल जुलकर बनाएं ईद- दीवाली। हरेक सुबे में अपना एक अलग पकवान बनता है, सजा दो सबको थाली में तो हिंदूस्तान बनता है। यही हिंदूस्तान है या हिंदूस्तान की पहचान है, यही हिंदूस्तान की गंगा-जमनी तहजीब है।
- मेने देखा था जो लोग रहते थे मर्दो की तरह, वे मसखरे बन गए है दरबार में रहने के लिए, अब तो बदनामी से शोहरत का वह रिश्ता है के लोग, नंगे हो जाते है लोग अखबार में बने रहने के लिए।
- मुझको भी सुल्तान बना दे या अल्लाह, चांद सितारे आकर जमीन को चूमें, ऐसा हिंदूस्तान बना दे या अल्लाह।
- मेरे नबी ने भी देखा था इस वतन की तरफ, यहां वफा है यह आपका इशारा था। मेरे नबी को भी हिंदुस्तान प्यारा था, यहीं गंगा-जमनी तहजीब है।
- खुदा वाले कभी दरिया की गहराई नहीं गिनते, जवा हो हौसले जिनके वो ऊंचाई नहीं गिनते, हमारा सिलसिला सिद्धीक उस्मानो वाली से है, हम इंचो में कभी सीने की चौड़ाई नहीं गिनते।
- सदमा किसी के दर्द का यूं आसपास था वो रो रहा था और मेरा दिल उदास था। बेटा अमीरे शहर का इयाज बन गया, बच्चा मगर गरीब का ही बेलिवाज था, बहुब ढूंढा मगर गुम हो गया है, मोहब्बत का सजल गुम हो गया है। इबादत तो वह करता है बराबर दुआओं का असर गुम हो गया है। मुखालिब रास्ता है गम नहीं है, मेरा भी हौसला कुछ कम नहंी है।
- दर्द जैसे बच्चो का लोरियां समझती है, दर्द जैसे बच्चो का लोरिया समझती है, वैसे बाप के गम को बेटियां समझती है। दर्द जैसे बच्चो का लोरियां समझती है। गोल- गोल चंदा को और चमकते सूरज को, बेटियां गरीबों की रोटियां समझती है। बेटियां गरीबो की रोटियां समझती है। मां मेरी उदासी को खुद ही जान जाती है, मां मेरी उदासी को खुद ही जान जाती है। जैसे दु:ख की शिलिनता को सिसकियां समझती है।
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