
कुसुम सरोवर
मथुरा। गोवर्धन परिक्रमा मार्ग पर राधाकुंड के बाद पड़ता है कुसुम सरोवर। कुसुम सरोवर का मनोरम दृश्य देखते ही बनता है। कुसुम वन कुसुमा सखी का कुंज और रास क्रीड़ा के समय श्रीकृष्ण द्वारा राधाजी की वेणी गूंथी जाने के रूप में प्रसिद्ध है। इतना ही काफी नहीं है, कुसुम सरोवर में एक ऐसी चीज है, जिसे हर कोई पाना चाहता है, लेकिन आज तक प्राप्त नहीं सका है।
पारस पत्थर और नाग मणि है सरोवर में
गोवर्धन परिक्रमा के समय कुसुम सरोवर में हमें स्नान करते मिले तपन गिरि महाराज। उन्होंने बताया- कुसुम सरोवर में पारस पत्थर और इच्छाधारी नाग की मणि है। मणि को हासिल करने के लिए कई महापुरुष आए, लेकिन कोई सुरक्षित नहीं निकला। कोई कोढ़ी तो कोई अंधा हो गया। पारस पत्थर को कैसे पा सकते हैं, सवाल पर कहा कि अमरनाथ में दो कबूतर हैं, तो क्या उन्हें कोई हासिल कर सकता है। उन्होंने स्नान के बाद कुसुम सरोवर का पानी भी पिया। इस बारे में पूछे जाने पर कहा- आत्मा सफा है तो सब सफा है। जब भी नहाते हैं, यहीं पर पानी पीते हैं।
जानलेवा हो सकती हैं शिलाएं
कुसुम सरोवर का पानी गंदा है। कुसुम सरोवर में स्नान न करने की चेतावनी भी लिखी हुई है। कुसुम सरोवर में शिलाएं हैं, जो स्नान के समय जानलेवा हो सकती हैं। यूं तो कुसुम सरोवर की मनोहारी छवि देखते ही बनती है, लेकिन सफाई का अभाव है। गोवर्धन परिक्रमा करने वाले श्रद्धालु प्रायः अंदर नहीं जाते हैं। बाहर से ही देखकर आगे बढ़ जाते हैं। रात्रि में कुसुम सरोवर की छवि देखते ही बनती है।
ये है इतिहास
कुसुम वन क्षेत्र में स्थित कुसुम सरोवर प्राचीन सरोवर है। कुसुम सरोवर के प्राचीन कच्चे कुंड को ओरछा (मध्य प्रदेश) के राजा बीर सिंह जू देव ने 1619 में पक्का कराया था। सन 1723 में भरतपुर (राजस्थान) के महाराजा सूरजमल ने इसे कलात्मक स्वरूप प्रदान किया। महारजा सूरजमल के पुत्र महाराजा जवाहर सिंह ने 1768 में यहां अनेक छतरियों का निर्माण कराया।
Published on:
22 Mar 2018 08:19 am

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