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SAWAN FESTIVAL जब भोलेनाथ से मिलने के लिए भगवान श्रीकृष्ण जोर-जाेर से रोने लगे

सावन के अंतिम सोमवार पर भगवान शंकर और कृष्ण की काैतुकमयी लीला को जानें, मनोकामना होगी पूरी।

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Sudhanshu Trivedi

Aug 15, 2016

lord shiva

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मथुरा.
आशेश्वर महादेव और चिन्ताहरण महादेव की कथा पढ़ने मात्र से ही इंसान अपने पापों से मुक्त हो जाता है। अपने भक्तों की सभी आशाओं को पूरा करनेवाले आशेश्वर महादेव का मन्दिर मथुरा से 50 किलोमीटर दूर नन्दगांव में स्थित है। भागवान आशुतोष को सर्वश्रेष्ठ वैष्णव माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त है भोलेनाथ। द्वापरकाल में कृष्णावतार लीला के समय भक्त और भगवान ने आम जनमानस के हितार्थ बड़ी ही कौतुकमयी लीला रची।


माता यशोदा ने भोलेनाथ को कन्हैया से नहीं मिलने दिया

ब्रजमंडल के नन्दबाबा यशोदा मैया के घर जब कन्हैया का लालन पालन हो रहा था, सम्पूर्ण ब्रजभूमि में आनन्द और उल्लास का वातावरण था सभी देवी, देवता, यक्ष, किन्नर नाना प्रकार के भेष रखकर अपने इष्ट के बाल स्वरूप के दर्शनों के लिये नन्दभवन में आ रहे थे। इसी क्रम में भगवान भोले नाथ भी बालकृष्ण प्रभु के दर्शन करने नन्दगांव में आये है। औघड़नाथ के भेष में शंकर जी नन्दभवन गये। मैया यशोदा से लाला के दर्शन करवाने को विनती की मैया ने दर्शन नही करवाये। शंकर जी ने लाख प्रयत्न किये पर माता यशोदा ने साफ कह दिया कि साँप बिच्छू आदि आपके लटक रहे है जब मुझे ही डर लग रहा है तो मेरा नन्हा सा बालक जरुर डर जायेगा। हार कर शंकर जी नन्दभवन से एक कोस दूर जंगल में कृष्ण दर्शन की आशा से धूनी रमा कर बैठ गये ।


भोलेनाथ से मिलने के लिए कन्हैया जोर-जोर से रोने लगे

भक्त की व्याकुलता भला भगवान कैसे सह पाते। नटखट कन्हैया ने कौतुक रच दिया और जोर जोर से रोने लग गये। मैया सारा गृहकाज छोड़ कर लाला को चुप कराने लगी। पर बालकृष्ण प्रभु तो चुप होने का नाम ही नही ले रहे थे यशोदा जी घबरा गयी गोपियां एकत्रित हो गयी सबने जतन किये पर लाला चुप नही हुआ। फिर एक वृद्ध गोपी बोली अरि यशोदा हमें तौ लगे कि तेरे लाला कूं नजर लग गयी है। मैया बोली कि अभी तो कोई आयो भी नाय है फिर भला नजर कैसे लग गयी , सखी बोलीं कि याद कर कि कोई आयो तौ नाओं मैया थोड़ी देर सोचकर बोली कि अरे एक साधू तौ आयो हतो। और लाला के दर्शन करिवे की जिद कर रह्यो हतो। पर मैंने दरसन नया करवाये! चतुर सखी बोली कि जरुर बो बाबाजी कछू कर गयो है। अब तौ वाकू ही बुलाओ। यशोदा ने एक सखी को जंगल में भेजा । सखी औघड़नाथ भेषधारी भोलेनाथ को नन्दभवन बुलाकर लायीं। भोलेनाथ ने कर यशोदा से पूछा- हां बोल मैया क्या काम है। मैया डरती हुई बोली महाराज आप जबते गये हो तभई ते मेरो लाला रो ही रो रह्यो है। भगवान आशुतोष समझ गये कि मेरे नाथ ने कोई खेल रच दिया है कुछ देर आंख मूंदकर ध्यान करने के बाद भोलेनाथ बोले- ला हमें दिखा।


कृष्ण के बालरुप को देख भोलेनाथ खो बैठे सुधबुध

वात्सल्य की साकार मूर्ति माँ यशोदा बिना एक पल गंवाये पलना में रो रहे अपने कारे कनुआ को लेकर नन्दभवन की चौखट पर खड़े औघड़बाबा के सन्मुख ले आयीं ।अपने इष्ट भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरुप के मनोहारी दर्शन करने शंकर भगवान गदगद हो गये नेत्र सजल हो उठे शरीर कम्पन करने लगा एक बारगी तो भोलेनाथ अपनी सुध ही भूल गये इधर बालकृष्ण लाल अपने अनन्य भक्त को देखकर बड़े जोर से खिलखिला रहे हैं ।मैया ने दोनों की ये अवस्था देखी तो जोर से बोली --बाबा ओ बाबा! शंकर जी तत्क्षण चेतना में लौटे और बोले मैया तेरा लाला को नजर लग गयी थी तो मैं अपने गुरु का ध्यान करके मंत्रों से उपचार कर रहा था अब देख उसी के प्रभाव से लाला हंस रहा है न। मैया बोली हां बाबा अब तो लाला खूब हंस रह्यो है। बाद में मैया ने भोलेनाथ से लाला के ब्याह आदि के वारे में भी पूछा। और शंकर जी के आग्रह पर उन्हें नन्दीश्वर पर्वत पर बने नन्दभवन के सिंहपौर पर ही स्थान भी दिया। आज भी नन्दभवन में शंकर जी का ये विग्रह नन्दीश्वर महादेव के नाम से विश्वविख्यात है। रोजाना ठाकुरजी के अभिषेक का जल सबसे पहले नन्दीश्वर महादेव को अर्पित किया जाता है। वहीं जंगल में जाकर शंकर जी ने जिस स्थान पर बैठकर कृष्ण दर्शन की आशा से धूनी रमायी थी वो स्थान आशेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।




सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं

आशेश्वर महादेव का मन्दिर मथुरा से 50 किलोमीटर दूर नन्दगांव में स्थित है। बड़ा ही रमणीय वन है वहाँ एक सुंदर सा कुण्ड है और कुण्ड के किनारे स्थित है आशेश्वर महादेव का मन्दिर। यहां शंकर जी का स्व प्रकट पाषाण का शिवलिंग है जिसे पूज कर लाखों करोड़ों भक्त शंकर जी की कृपा प्राप्त करते है। ब्रजवासियों की मान्यता है कि इस पावन भूमि में आने पर स्वयं भगवान शंकर की आशा पूर्ण हुई है। वर्तमान मे भगवान शंकर इस स्थल पर आकर श्रद्धा भाव से पूजा अर्चना करने वाले समस्त कृष्ण भक्तों की सभी प्रकार की आशाओं (मनोकामनाओं) को पूर्ण करते हैं। सुशील गोस्वामी नन्द बाबा मंदिर सेवायत ने बताया की मैंने स्वयं सैकड़ों लोग ऐसे देखे हैं कि जिन्होंने भाव के साथ आशेश्वर महादेव का अभिषेक कर अपनी मनोकामना भगवान भोलेनाथ के समक्ष रखी और भगवान शंकर ने उनकी सभी कामनाएं पूर्ण की हैं।


समस्त चिंताओं का हरण करते हैं चिन्ताहरण महादेव

ये लीला नन्दभवन नन्दगांव और आशेश्वर वन से जुड़ी है। ठीक इसी प्रकार की लीला दूसरे कल्पना में यमुनापार महावन में भी हुई है। धार्मिक ग्रंथों में मिले वर्णन के अनुसार नन्दबाबा की नगरी महावन में नन्दगांव की तरह ही शंकर जी बालकृष्ण प्रभु के दर्शन करने आये थे और बिल्कुल नन्दगांव जैसी पूरी लीला महावन में भी घटित हुई है। महावन में भी नन्दभवन है। जब शंकर जी दर्शन करने आये तो यशोदा मैया के मना करने पर भोलेबाबा जैसे नन्दगांव में आशेश्वर वन मे जाकर धूनी रमा कर बैठे थे ठीक उसी तरह महावन के समीप यमुना के तट पर शंकर जी अपनी चिन्ता को लेकर धूनी रमाकर बैठे हैं। यहां पर ठाकुरजी ने शंकर जी की ये चिन्ता कि दर्शन होंगे या नही दर्शन कराके दूर किया। और नन्दलाला की कृपा से इसी स्थान पर उन्हें निवास दिया। तभी से यहां स्थापित शिवलिंग चिन्ताहरण महादेव के नाम से प्रसिद्ध हो गया। प्रति वर्ष लाखों लोग यहां आकर चिन्ताहरण महादेव जी की श्रद्धा भाव से पूजा अर्चना करते हैं और अपनी चिन्ताओं का हरण भोलेबाबा से कराते हैं। सावन के महीने में आशेश्वर महादेव और चिन्ताहरण महादेव मन्दिर पर भक्तों का सैलाब उमड़ता है।

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