1 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

मेरी खबर

icon

प्लस

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

 आपको रोमांचित कर देगी रिक्शाचालक रहे मैदुली की ये स्टोरी

वृन्दावन में रिक्शा चलाकर, बेलदारी और गुरुकुल विवि में चपरासी की नौकरी से जीवन की शुरूआत करने वाले रामदयाल मैदुली भारत सरकार में अधिकारी रहे।

2 min read
Google source verification

image

Bhanu Pratap Singh

Sep 19, 2016

ram dayal maiduli

ram dayal maiduli

मथुरा। वृन्दावन में चिंतन -मनन, अध्ययन में खोये और दर्शन, धर्म, ज्योतिष आदि विषयों की पुस्तकों के मध्य सुबह से शाम व्यतीत करने वाले 72 साल के डॉ. रामदयाल मैदुली को बहुत कम लोग जानते हैं। रामदयाल मैदुली गौरवशाली मेहनत, लगन, ईमानदारी का एक विलक्षण व जीवंत उदाहरण हैं।


11 साल की उम्र में वृंदावन आए
वृन्दावन में रिक्शा चलाकर, बेलदारी और फिर गुरुकुल विवि में चपरासी की नौकरी से जीवन की शुरूआत कर भारत सरकार के ''विज्ञापन व दृश्य प्रचार निदेशालय'' में एक बड़े अधिकारी के पद पर कार्य कर चुके रामदयाल मैदुली सन 1960 में चमोली, गढ़वाल से 11 साल की अवस्था में अकेले वृन्दावन आये थे। बाप का घर दाने-दाने को मोहताज था। मेहनत-मजदूरी कर पेट भरा।


चपरासी रहते हुए पीएचडी की
वृन्दावन के गुरुकुल विवि में चौकीदार रख लिए गए। क ख ग से भी कोसों दूर रहने वाले रामदयाल जब वेदों और गुरुओं - छात्रों के सानिध्य में रहे तो उनके जीवन ने अप्रत्याशित करवट ली। भाषा की वर्णमाला को पहचानना शुरू किया। लगन और स्वाध्याय ने कमाल दिखाया। बीए करने के बाद दर्शन शास्त्र, प्राचीन इतिहास, संस्कृत में एमए किया। पीएचडी की। इस दैरान ट्यूशन किये।


वृंदावन में नहीं मिली नौकरी
डॉ. रामदयाल मैदुली ने बताया कि पुस्तकें सबसे अच्छी और वफादार मित्र साबित हुईं। धर्म और दर्शन के मर्म को समझना शुरू किया तो वृन्दावन के नामी धर्मगुरुओं का सानिध्य मिला। स्वामी अखंडानंद, स्वामी कृष्ण नन्द आदि के आश्रम में रहने का अवसर मिला। स्वामी कृष्ण नन्द के आश्रम में उमा भारती (वर्तमान में केंद्रीय मंत्री ) को वेदों की शिक्षा देने की बात उन्हें आज भी याद है। डा. मैदुली को इस बात की हैरत और दुःख है कि वृन्दावन के स्कूल - कालेजों के प्रबंधकों ने उनके बार-बार आवेदन करने पर शिक्षक की नौकरी नहीं दी। वह शिक्षक बनना चाहते थे।


स्वाध्याय का व्यसन
डॉ. मैदुली ने बताया कि एक दिन अचानक अखबार में नौकरी का विज्ञापन पढ़ा। आवेदन भेजा और फिर आकर्षक नौकरी पा ली। सरकारी नौकरी में रहते रामदयाल मैदुली अपने विषय और स्वाध्याय के व्यसन से कभी नहीं भटके। ज्योतिष शात्र में महारत हासिल कर ली लेकिन पद और ज्ञान का गुरूर उन्हें छूकर न दिया। जो कुछ सीखा, पढ़ा, देखा, भोगा उसमें मौलिक चिंतन का मिश्रण किया और फिर लेखन में जुट गए। राष्ट्रीय समाचार पत्रों में अनेक लेख और पुस्तकें प्रकाशित हुईं।


मेरी भवसागर यात्रा
'' विश्व के प्रमुख धर्मों की कहानी '' पुस्तक का उल्लेख रामदयाल मैदुली की विद्वता का प्रमाण देने के लिए पर्याप्त है। आजकल रामदयाल मैदुली अपनी आत्मकथा '' मेरी भवसागर यात्रा'' के लेखन में व्यस्त हैं। इस पुस्तक को लिखने का मकसद अपने अमर होने की ख्वाहिश नहीं है, बल्कि यह पुस्तक निर्बल का सहारा बनेगी। दर दर भटकते नौजवानों को जीवन की राह दिखाएगी।


महत्वपूर्ण क्या
रामदयाल मैदुली वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था और रोटी-कपड़ा, मकान के लिए भटकते जन जन की दुर्दशा को लेकर बेहद चिंतित हैं। डॉ. मैदुली अपने ज्योतिष ज्ञान के जादू के पाश में दिग्गज राजनेताओं को आसानी बाँध सकते हैं। कान्हा की क्रीड़ा स्थली वृन्दावन में कुक्करमुत्तों की तरह पैदा हुए धर्म भुनाऊ विद्वानों की हरकतों से भलीभांति वाकिफ हैं, लेकिन डॉ. मैदुली के लिए '' महत्वपूर्ण यह नहीं कि दुनिया क्या कर रही है. उनके लिए महत्वपूर्ण यह है कि उनको क्या करना चाहिए।''

ये भी पढ़ें

image