
विश्वकर्मा का ये भव्य मंदिर, जिसे मुगल शासक भी नहीं पहुंचा पाये थे कोई नुकसान
मथुरा। यूं तो ब्रज की धरा भगवान भी कृष्ण की लीलाओं से रंगी हुई है, इन्हीं लीलाओं में से एक है गोकुल में बना ये अद्भुत मंदिर। इस मंदिर को 84 खम्भे के नाम से जाना जाता है। यहां हर दिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु अपने आराध्य के दर्शन करने आते हैं।
ये है कहानी
मथुरा से करीब 30 किलोमीटर दूर बसी है पुरानी गोकुल, यही बाबा नंद का जन्मस्थान भी है। मान्यता के अनुसार यहां बाल्य अवस्था में कृष्ण भगवान ने अनेक लीलायें कीं।नन्द भवन के सेवायत गोस्वामी मोर मुकुट पाराशर ने बताया कि ये नंद बाबा का घर है। यहां यशोदा मईया के द्वारा भगवान श्री कृष्ण का पालन पोषण किया गया। इस मंदिर को चौरासी खम्भे के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर में लगे 84 खम्भे पर अलग अलग डिजाइन बनी है। खास बात ये है कि हर खम्भे पर मोहक कलाकारी है, जो सहज ही अपनी ओर आकर्षित करती है।
विश्वकर्मा ने किया था इस मंदिर का निर्माण
सेवायत गोस्वामी मोर मुकुट पाराशर ने बताया कि विश्वकर्मा ने इस भवन का निर्माण किया था। मुगल शासन में इस मंदिर को तोड़ने का प्रयास किया गया था, लेकिन भगवान श्री कृष्ण की कृपा होने के कारण इस मंदिर को मुगल शासक बाबर भी तोड़ नहीं पाया। नन्द भवन में हजारों साल पुराना वृक्ष लगा हुआ है, इस वृक्ष की खासियत ये है कि ये कभी सूखता नहीं है, चाहे गर्मी हो, चाहे सर्दी, ये वृक्ष सदैव हरा भरा रहता है। मान्यता ये है कि इस वृक्ष पर सच्चे मन से बांधा हुआ धागा हर मन्नत को पूरी करता है और जब मन्नत पूरी हो जाती है तो इस मन्नत के धागे को खोल दिया जाता है।
Published on:
16 Oct 2018 06:51 pm
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