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भारत संविधान सभा में शामिल ये मुस्लिम महिला बनीं थीं उप्र की पहली महिला विधायक

वे भारतीय संविधान सभा की एकमात्र मुस्लिम महिला रहीं। इस संविधान सभा में रहकर देश के संविधान का मसौदा तैयार करने में अहम जिम्मेदारी भी निभाई। इसके अलावा वे 20 साल तक भारत महिला हाकी महासंघ की भी अध्यक्ष रहीं। इस मुस्लिम महिला का नाम था बेगम कुदसिया ऐजाज रसूल। 'मुस्लिम महिलाएं और भारत' पर आयोजित एक वेबिनार में बेगम कुदसिया के बारे में चर्चा हुई।

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मेरठ

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Kamta Tripathi

Apr 06, 2022

भारत संविधान सभा में शामिल ये मुस्लिम महिला बनीं थीं उप्र की पहली महिला विधायक

भारत संविधान सभा में शामिल ये मुस्लिम महिला बनीं थीं उप्र की पहली महिला विधायक

बेगम क़ुदसिया ऐज़ाज़ रसूल देश की संविधान सभा में एकमात्र मुस्लिम महिला थीं। जिन्हें भारत के संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए जिम्मेदार मिली थीं। इसके अलावा बेगम कुदसिया ने 20 साल तक भारत महिला हॉकी महासंघ के अध्यक्ष का पद संभाला और एशियाई महिला हॉकी महासंघ की अध्यक्ष भी रहीं। यह बातें एक बेवीनार के दौरान शाहीन परवीन ने कहीं। मुस्लिम महिलाओं पर आयोजित वेबिनार में शाहीन परवीन ने कहा कि बेगम कुदसिया का जन्म ब्रिटिश भारत के लाहौर में हुआ था। वह सर जुल्फिकार अली खान की बेटी थी। जो पंजाब की एक रियासत मलेरकोटला के शासक परिवार से थे और महमूदा सुल्ताना जो लोहारू के नवाब, नवाब अलाउद्दीन अहमद खान की बेटी थी। इसके बाद उन्होंने 1929 में अवध (उत्तर प्रदेश) के हरदोई जिले में संडीला के तालुकदार (जमींदार) नवाब एजाज रसूल से शादी की।

उप्र विधानसभा में पहुंचने वाली पहली विधायक बनीं
बेगम कुदसिया ने भारत सरकार अधिनियम 1935 के अधिनियम के बाद चुनावी राजनीति में प्रवेश किया। जबकि, 1937 के चुनावों में, वह उन कुछ महिला उम्मीदवारों में से एक थीं, जिन्होंने एक गैर-आरक्षित सीट से चुनाव लड़ा और यूपी विधान सभा के लिए चुनी गईं। वह 1952 तक कार्यालय में रहीं और 1937 से 1940 तक परिषद के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य किया और 1950 से 1952-54 तक परिषद में विपक्ष के नेता के रूप में कार्य किया। वह भारत की पहली महिला और इस विशेष स्थान तक पहुंचने वाली दुनिया की पहली मुस्लिम महिला बनीं।

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बेगम रसूल को तीसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। खातून रजिया बेगम ने कहा कि बेगम रसूल ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित सीटों की मांग को छोड़ने के लिए मुस्लिम नेतृत्व के बीच आम सहमति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साथ ही उन्होंने मुसलमानों के लिए 'अलग निर्वाचक मंडल' रखने के विचार का विरोध किया। उन्होंने बताया कि बेगम रसूल ने 'थ्री वीक्स इन जापान' किताब भी लिखी और उनकी आत्मकथा का नाम 'फ्रॉम परदाह टू पार्लियामेंट: ए मुस्लिम वुमन इन इंडियन पॉलिटिक्स' है। उन्होंने कहा कि बेगम रसूल के भारतीय समाज में किए गए योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकेगा।