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‘दंगल’ के लिए मुर्गों को खिलाया जाता है स्टेरॉयड और देसी घी, पूरी Diet जानकर हो जाएंगे हैरान

Highlights: — मुर्गों की लड़ाई पर लगता है लाखों का दाव — परिवार से भी ज्यादा रखा जाता है मुर्गे का ध्यान — मुर्गा लड़ाई के दौरान खिलाया जाता है स्टेरायड — त्यौहारों के मौसम में और साप्ताहिक बाजार में लगते हैं दांव

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मेरठ

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Rahul Chauhan

Mar 16, 2021

केपी त्रिपाठी

मेरठ। बागपत में मुर्गों की लड़ाई के दौरान पुलिस छापे में पकड़े गए 41 लोगों का मामला सामने आने के बाद मुर्गों की लड़ाई एक बार फिर सुर्खियों में है। दरअसल पश्चिम उत्तर प्रदेश में खासकर मेरठ, बागपत, शामली, मुजफ्फरनगर आदि जिलों में मुर्गों की लड़ाई करवाना आम बात है। ये खेल लोगों के शौक और उनकी प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ है। मुर्गों की लड़ाई में हजार से लाखों का दांव लगता है। यह मेरठ के लोगों का भी खासा शौक है। मेरठ के ग्रामीण क्षेत्रों में क्रेज इतना है कि हर दांव में लाखों रुपए लगते हैं। मेरठ के किठौर, हस्तिनापुर, मवाना, सरधना आदि क्षेत्रों में मुर्गा लड़ाई का कोई खास सीजन नहीं हैं। यहां के गांवों में लगने वाले साप्ताहिक बाजारों में भी मुर्गे गुपचुप तरीके से लड़ाए जाते हैं।

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किठौर निवासी मुर्गा ट्रेनर रफीकुद्दीन ने बताया कि मुर्गा लड़ाई के शौकीनों की प्रतिष्ठा मुर्गे से जुड़ी होती है। लिहाजा उसे बड़े जतन से पाला जाता है और उसके खान-पान का पूरा ध्यान रखा जाता है। मुर्गा मालिक परिवार से कहीं ज्यादा मुर्गे के खानपान का ध्यान रखते हैं। वे मुर्गे को देशी जड़ी बूटियां खिलाते हैं, जिससे उसकी स्फूर्ति और वार करने की क्षमता बढ़ जाती है। इसके अलावा उनको ताकत के लिए देशी घी भी पिलाया जाता है। मुर्गे को हिंसक बनाने के लिए गौर (बायसन) का पित्त भी खिलाया जाता है। साप्ताहिक बाजार के एक हिस्से में गोल घेरा बनाकर मुर्गों की लड़ाई कराई जाती है, इस जगह को कुकड़ा गली कहते हैं। यहां इलाके के दूर-दूर के गांवों से लोग विशेष रूप से ट्रेन्ड किए गए मुर्गे लेकर पहुंचते हैं। लड़ाई शुरू होने से पहले मुर्गे के पैर में धागे की मदद से छुरी बांध देते हैं। इस छुरी से मुर्गा प्रतिद्वंदी पर वार करता है, प्रतिद्वंदी मुर्गे की मौत के बाद ही खेल खत्म माना जाता है।

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मुर्गों को दिया जाता है स्टेरॉयड

प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से मुर्गे की ताकत बढ़ाने के अलावा मुर्गों को स्टेरॉयड जैसी दवाएं भी दी जाती हैं। इसके लिए ग्रामीण अवैध तरीके से डेक्सामेथासोन, बीटा मैथासोन के इंजेक्शन और प्रेडनीसोल की गोलियां मुर्गे को खिलाते हैं। ये दवाएं आसानी से मिल जाती हैं और मुर्गों पर इनका असर बेहद तेजी से होता है। इन दवाओं का नशा इतना तेज होता है कि लड़ते वक्त गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी मुर्गा मैदान नहीं छोड़ता। मुर्गों की लड़ाई में सबसे ज्यादा असील प्रजाति के मुर्गों को लड़ाया जाता है। इस मुर्गे की नजर शार्प और टांगे लम्बी होती हैं, जो लड़ाई में काफी सहायक होती है।


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