8 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

catch_icon

प्लस

epaper_icon

ई-पेपर

profile_icon

प्रोफाइल

ये है प्रसिद्ध पुरामहादेव मंदिर, जानिए यहां लाखों की संख्या में क्यों उमड़ते हैं शिव भक्त

शिवरात्रि पर जलाभिषेक और कावड़ यात्रा को लेकर एडीजी कानून-व्यवस्था खुद यहां की निगरानी करते हैं।

3 min read
Google source verification

मेरठ

image

Rahul Chauhan

Aug 03, 2018

Shivbhakt during

ये है प्रसिद्ध पुरामहादेव मंदिर, जानिए यहां लाखों की संख्या में क्यों उमडते हैं शिव भक्त

बागपत। श्रावण मास की शिवरात्रि पर बागपत के सिद्धपीठ पुरामहादेव मंदिर में जलाभिषेक करने के लिए आस्था का सैलाब उमड़ता है। कई लाख शिवभक्त कावड़िए यहां जलाभिषेक करते हैं। लाखों शिवभक्त कावड़िए जलाभिषेक करने के लिये दुसरे प्रदेशों से भी यहां आते है। मान्यता है कि इस मंदिर में शिवलिंग की स्थापना भगवान परशुराम ने की थी। इसलिए इसे परशुरामेश्वर के नाम से भी जाना जाता है।

यह भी पढ़ें-6 करोड़ का सोना पहनकर कांवड़ लाता है ये शख्स, कभी कंधे पर लादकर बेचता था कपड़े

बता दे कि इस मंदिर को महादेव मंदिर भी कहते हैं। करीब 20 लाख से ज्यादा शिवभक्त कावडिए यहां जलाभिषेक करते हैं। जलाभिषेक को लेकर सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम शासन द्वारा किए जाते हैं। पुलिस, पीएसी व आरएएफ के साथ-साथ सीसीटीवी से भी निगरानी की जाती है। शिवरात्री से पहले ही मंदिर परिसर के बाहर कई किलोमीटर लंबी कतारें लग जाती हैं। इस मंदिर की मान्यता दूर-दूर तक है। कई प्रदेशों से शिवभक्त कावड़िए यहां जलाभिषेक करके खुद को धन्य समझते हैं। शिवरात्रि पर जलाभिषेक और कावड़ यात्रा को लेकर एडीजी कानून-व्यवस्था खुद यहां की निगरानी करते हैं। इसके अलावा बागपत के ऐतिहासिक पुरामहादेव मंदिर का हवाई निरीक्षण भी किया जाता है। साथ ही मंदिर और कावडियों पर हेलिकॉप्टर से पुष्पवर्षा भी की जाती है।

यह भी पढ़ें-रोडवेज बस की चपेट में आए आधा दर्जन कावड़ियों में दो की हुर्इ दर्दनाक मौत, सीएम ने किया ये एेलान

पुरामहादेव (परशुरामेश्वर) क्यों है मान्यता
दिल्ली से सटे एनसीआर के बागपत जिले से 25 किमी पूर्व की ओर बालैनी कस्बे के निकट एक छोटे से गांव पुरा में भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर है, जो शिवभक्तों की श्रृद्धा का केन्द्र है। इसे एक प्राचीन सिद्धपीठ भी माना गया है। केवल इस क्षेत्र के लिये ही नहीं बल्कि पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसकी मान्यता है। कहते हैं कि परशुराम ने पिता के कहने पर अपनी मां का सिर धड़ से अलग कर दिया था। पितृ भक्ति से प्रसन्न होकर जमदग्नि ऋषि ने परशुराम को अजेय होने का वरदान और एक फरसा दिया। आत्मग्लानि के बाद नारद मुनि के कहने पर परशुराम ने कजरी वन में शिवलिंग की स्थापना कर घोर तपस्या की। प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उनको दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। परशुराम ने अपनी माता को जीवित करने का वरदान मांगा। भगवान शिव की कृपा से उनकी माता जीवित हो गई।

यह भी पढ़ें-योगी की फोटो लगी टीशर्ट के साथ तिरंगे की बढ़ी इतनी डिमांड कि कांवड़ियों के लिए कम पड़ गया सामान

कहते हैं कि जहां पर परशुरामेश्वर पुरामहादेव मंदिर है। काफी पहले यहां पर कजरी वन हुआ करता था। इसी वन में जमदग्नि ऋषि अपनी पत्नी रेणुका सहित अपने आश्रम में रहते थे। रेणुका प्रतिदिन कच्चा घड़ा बनाकर हिंडन नदी से जल भर कर लातीं थीं। वह जल शिव को अर्पण किया करती थीं। हिंडन नदी, जिसे पुराणों में पंचतीर्थी कहा गया है और हरनन्दी नदी के नाम से भी विख्यात है वह यहां पास से ही निकलती है। ऐतिहासिक तथ्यों की माने तो भगवान परशुराम की तपोस्थली और वहां स्थापित शिवलिंग खंडहरों में तब्दील हो गया था।

यह भी देखें-बस कांवड़ मार्ग पर डिवाइडर पर चढ़ी करीब 40 यात्री घायल

वर्षों बाद लंडौरा के राजा रामदयाल की पत्नी एक दिन इसी वन से गुजरी तो उनका हाथी एक जगह ठहर गया। प्रयास करने के बावजूद हाथी टस से मस नहीं हुआ तो रानी ने शक होने पर वहां पर खुदाई कराई, जिससे वहां एक शिवलिंग प्रकट हुआ। इसके बाद रानी ने वहीं पर मंदिर का निर्माण करा दिया। धार्मिक मान्यताओं के लिए पूरे विश्व में अलग पहचान रखने वाले भारतवर्ष में कांवड़ यात्रा के दौरान भोले के भक्तों में अद्भुत आस्था, उत्साह और अगाध भक्ति के दर्शन होते हैं। कांवडियों के सैलाब में रंग-बिरंगी कांवड़ें देखते ही बनती हैं। प्रशासन ने इस कांवड मेले को सम्पूर्ण कराने के लिए कमर कस ली है। पांच अगस्त से सभी वाहन बंद कर दिए जाएंगे और दस अगस्त तक ये सड़कें केवल शिव भक्तों के खिल ही खुलेंगी।