
मेरठ. दिल्ली में जमे किसानों की लड़ाई चाहे किसी भी नतीजे पर पहुंचे, लेकिन इस बार आंदोलन में किसान अकेले नहीं, बल्कि उनका परिवार और गांव के नौजवान भी साथ हैं। वे नौजवान जो खेत की पगडंडियों से निकलकर कार्पोरेट जगत में अपनी धाक जमा रहे हैं। अब वे सिंधु बार्डर पर जाकर धरनास्थल की रसोई संभाल रहे हैं और आंदोलनरत किसानों के लिए रोटी सेंक रहे हैं।
मेरठ के गगसोना गांव से सैकड़ों किसान दिल्ली के बार्डर पर डेरा डाले हुए हैं। ये भी कृषि अधिनियम की वापसी के लिए आंदोलन कर रहे हैं। अब किसानों के साथ उनके बच्चों ने भी सिंधु बार्डर पर डेरा डाल दिया है। गगसोना के नवीन प्रधान जो किसान के पुत्र हैं और गांव की पगडंडियों से निकलकर कार्पोरेट जगत में अपनी पहचान बनाई। वह अपने गांव के 50 से अधिक नौजवान साथियों के साथ आंदोलन में कूद चुके हैं। नवीन और उनके साथियों ने सिंधु बार्डर पर जाकर किसानों के लिए रोटी बनाने का काम शुरू कर दिया है। उनके साथ गए युवाओं की टीम ने खाने-पीने के मैनेजमेंट की कमान अपने हाथ में ले ली है।
नवीन ने 'पत्रिका' से हुई टेलीफोनिक बातचीत में बताया कि आज किसान के पास उसकी जमीन और खेत में होने वाली पैदावार के अलावा और कुछ भी नहीं है। सरकार किसानों को पूरी तरह से बर्बाद कर देना चाहती है, लेकिन सरकार को याद रखना चाहिए कि बाबा महेंद्र सिंह टिकैत वाला दौर नहीं है। अब किसानों के बेटे जागरूक हो गए हैंं, उन्हें यह पता है कि अपना हक कैसे लिया जाता है। इसलिए सरकार इस भूल में न रहे कि वह आसानी से विधेयक लागू कर किसानों पर थोप देगी।
सुबह-शाम किसानों के लिए बनाई जा रही रोटियां
गगसोना से गए युवा सिंधु बार्डर पर किचन संभाले हुए हैं। वे लोग सुबह-शाम किसानों के लिए रोटियों बना रहे हैं। इतना ही नहीं दिन में अन्य जरूरी चीजों का भी इंतजाम किया जा रहा है। जरूरी दवाइयां और पानी का इंतजाम भी किसानों के लिए युवा ही कर रहे हैं।
Published on:
07 Dec 2020 11:40 am
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