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Shardiya Navratri 2019: वेश्यालयों की मिट्टी से बनाई जाती हैं देवी की मूर्तियां, वजह जानकर हैरान रह जाएंगे, देखें वीडियो

Highlights बंगाल के सोनागाछी से आयी दुर्गा और काली देवी की मूर्तियां मेरठ में बंगाल से आयी वेश्याओं के कोठे की मिट्टी से बनी मूर्तियां शारदीय नवरात्रि 2019 में देवी की मूर्तियों की बढ़ी डिमांड  

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मेरठ। Shardiya Navratri 2019 मनाने की तैयारियां जोर-शोर से शुरु हो गई है। पहले यहां दुर्गा पूजन के लिए दुर्गा की बड़ी मूर्तियों का उपयोग किया जाता था जो कि पश्चिम बंगाल से आती थी। इन मूर्तियों की खासियत होती थी कि वे वेश्याओं के घर या फिर उसके कोठे से मिली मिट्टी की बनी होती थी। अब इन बड़ी मूर्तियों का स्थान छोटी मूर्तियों ने ले लिया है। पहले ये मूर्तियां मेरठ में ही तैयार की जाती थी, लेकिन जब से मेरठ का रेडलाइट एरिया खत्म हुआ है। पश्चिम बंगाल से इन मूर्तियों को फिर से आर्डर देकर मंगाया जा रहा है।

बढ़ गयी डिमांड, ये है खासियत

नवरात्रि पर इस बार पश्चिम बंगाल से आई इन मूर्तियों की खासियत है कि ये मूर्तियां छोटी हैं और लोगों के बजट के हिसाब से भी है। पहले जहां इन मूर्तियों की कीमत हजारों में होती थी। आज इन मूर्तियों की कीमत इस महंगाई के जमाने में सिमटकर सैकड़ों में हो गई है। बंगाल से आई इसी तरह की मूर्तियों की डिमांड लोगों के बीच है। ये मूर्तियां डेढ़ सौ रुपये में बिक रही है। माता काली की इन मूर्तियों की खासियत है कि ये मूर्तियां वेश्याओं के कोठे या घर की मिट्टी की बनी हुई हैं। ऐसी मूर्तियों की बहुत मान्यता है और इनकी सिद्धि होती है। इस मान्यता के अनुसार इन मूर्तियों को बनाने के लिए तवायफ के घर बाहर या रेडलाइट एरिया से मिट्टी लाई जाती है।

पहले मेरठ में बनाई जाती थी मूर्तियां

पश्चिम उप्र में मेरठ दशकों से मूर्ति बनाने का केंद्र रहा है, आज भी है। मेरठ में मूर्ति बनाने वाले कारीगर दिनेश कुमार बताते हैं कि अब मेरठ में पिछले पांच साल से इस तरह की मूर्तियां बननी बंद हो गई है। पहले ये मूर्तियां मेरठ में ही बनाई जाती थी। जब कबाड़ी बाजार स्थित कोठों की मिट्टी भी इन मूर्तियों को बनाने में मिलाई जाती थी, लेकिन जब से पुलिस और अन्य संगठनों का दबाव पड़ा वहां से मिट्टी मिलनी भी बंद हो गई। इधर, दो साल में तो मेरठ का रेड लाइट एरिया ही खत्म हो गया। अब ये मूर्तियां बंगाल से मंगाई जाती हैं। बंगाल के सोनागाछी इलाकों में ये मूर्तियां बनाई जाती हैं। दिनेश कुमार ने बताया कि इस बार वहां से काली की मूर्ति मेरठ में आई हैं। इस मूर्ति की बहुत डिमांड है। वह पिछले एक सप्ताह से मूर्ति बेचने का काम कर रहे हैं। प्रतिदिन 15 से 20 मूर्ति काली मां की बिक जाती है। उन्होंने बताया कि वेश्याओं के कोठे या घर की मिट्टी को जब तक मूर्ति निर्माण में इस्तेमाल नहीं किया जाता तब तक वह पूर्ण नहीं मानी जाती।

ये हैं मान्याताएं

- दुर्गा मां ने अपनी एक भक्त वेश्या को सामाजिक तिरस्कार से बचाने के लिए उसे वरदान दिया था कि उसके यहां की मिट्टी के उपयोग के बिना प्रतिमाएं पूरी नहीं होंगी।

- मान्यता है कि जब भी कोई व्यक्ति ऐसी जगह पर जाता है तो वह अपनी सारी अच्छाइयां बाहर ही छोड़ जाता है, यही कारण है कि सेक्स वर्कर के घर के बाहर की मिट्टी को मूर्ति में लगाया जाता है।

- कहा जाता है कि नारी 'शक्ति' है और अगर वह कहीं गलत है तो उसके पीछे समाज और वक्त की खामियां रही होंगी। इसलिए उन्हें सम्मान देने के लिए ऐसा किया जाता है।

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