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हाय रे सिस्टम! व्हीलचेयर देने से किया इनकार तो दिव्यांग पिता को गोद में उठाकर घूमता रहा लाचार बेटा

Meerut News: मेरठ के लाला लाजपत राय मेमोरियल (LLRM) मेडिकल कॉलेज में सिस्टम की संवेदनहीनता का मामला सामने आया है। अस्पताल प्रशासन ने एक दिव्यांग मरीज को व्हीलचेयर देने से इनकार कर दिया।

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मेरठ

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Namrata Tiwary

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Namrata Tiwary

Feb 19, 2026

son carried father

दिव्यांग पिता को दोस्त के साथ ले जाता बेटा

Meerut News: मेरठ के सरदार वल्लभ भाई पटेल चिकित्सालय (LLRM मेडिकल कॉलेज) में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की हालत बदतर है। परतापुर के दिव्यांग निवासी नरेंद्र बेटे के साथ अपने इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे थे। नियमानुसार उन्हें व्हीलचेयर मिलनी चाहिए थी, लेकिन जब उनके परिजनों ने अस्पताल के कर्मचारियों से मदद मांगी तो उन्हें दो टूक जवाब मिला। कर्मचारियों ने संवेदनहीनता की हदें पार करते हुए कह दिया यहां से व्हीलचेयर नहीं मिलेगी अपनी व्यवस्था खुद कीजिए।

गोद में उठाकर कराई जांच

दिव्यांग नरेंद्र ने बताया कि ओपीडी में डॉक्टर से मिलने के बाद अलग-अलग कमरों में जांच के लिए भेजा गया। अस्पताल परिसर बड़ा होने के कारण बिना व्हीलचेयर के एक विभाग से दूसरे विभाग जाना मुश्किल था। जब बार-बार व्हीलचेयर मांगने पर भी मदद नहीं मिली और ओपीडी का समय खत्म होने लगा, तो नरेंद्र के बेटे ने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर अपने पिता को गोद में उठाया और पूरे अस्पताल परिसर में दौड़ता रहा ताकि समय पर इलाज हो सके।

सिस्टम में नहीं हो रहा सुधार

हैरानी की बात है कि नरेंद्र के साथ यह घटना पहली बार नहीं हुई है। उन्होंने दर्द साझा करते हुए बताया कि पिछली बार जब वे अस्पताल आए थे, तब भी उन्हें व्हीलचेयर देने से मना कर दिया गया था। उस समय भी उनका बेटा ही उन्हें गोद में उठाकर डॉक्टर के पास ले गया था। अस्पताल प्रशासन का तर्क है कि व्हीलचेयर केवल ओपीडी के अंदर के लिए है, यदि मरीज को जांच के लिए बाहर जाना है तो उसे सुविधा नहीं दी जाएगी।

लापरवाही का अड्डा बना मेडिकल कॉलेज

मेरठ मेडिकल कॉलेज में लापरवाही की यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी ऐसे कई मामले आए हैं जहां मरीजों को बेड खाली होने के बावजूद कुर्सी पर बैठकर ऑक्सीजन लेनी पड़ी। कभी फूड ट्यूब लगे गंभीर मरीजों को भर्ती करने से इनकार कर दिया गया। इन सब घटनाओं के बावजूद अस्पताल प्रबंधन दोषी कर्मचारियों पर ठोस कार्रवाई करने के बजाय चुप्पी साधे रहता है। इस संवेदनहीनता का खामियाजा गरीब और लाचार मरीजों को भुगतना पड़ रहा है।