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विश्व विजेता बादशाह की महारानी ने अपने पति की रक्षा के लिए भारत के इस राजा को भेजी थी राखी

रक्षा बंधन 2018 पर विशेष

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विश्व विजेता बादशाह की महारानी ने अपने पति की रक्षा के लिए भारत के इस राजा को भेजी थी राखी

मेरठ। भारत देश में रक्षा बंधन मनाने की परंपरा तो सदियों काल से चली आ रही है। भाई अपनी बहनाें की रक्षा के लिए राखी बांधने पर वचन भी निभाते थे। इस वचन निभाने के लिए उन्हें अपनी जान की भी कीमत चुकानी पड़ जाती थी। रक्षा बंधन को लेकर इतिहास में ढेरों कहानियां भरी हुई हैं, लेेकिन बहुत कम लोग इतिहास की इस गाथा से परिचित होंगे, जो कि रक्षा बंधन से ही जुड़ी एक और कहानी है।

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सिकंदर की पत्नी ने पुरू को भेजी थी राखी

जिस समय सिकंदर को दुनिया फतह करने का जुनून सवार था और वह सभी देश पर अपनी विजय पताका फहराता जा रहा था। उसने भारत को जीतने के उद्देश्य से जब पश्चिम की ओर से भारत पर आक्रमण किया तो राह उसके लिए आसान नहीं थी। भारत में पुरू सबसे शक्तिशाली राजा था। सिकंदर राजा पुरू के आगे कहीं न टिक सका। राजा पुरू ने सिकंदर को मारने की कसम खाई। यह बात सिकंदर भी समझ गया था कि अब उसका भारत से जीवित बचकर निकलना आसान नहीं है। सिकंदर की पत्नी को जब यह बात पता चली तो वह परेशान हो उठी। सिकंदर की पत्नी ने पति के हिंदू शत्रु पुरू यानी कि राजा पोरस को राखी बांधकर अपना मुंहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन लिया। पुरूवास ने युद्ध के दौरान सिकंदर को जीवनदान दिया। यही नहीं सिकंदर और पोरस ने युद्ध से पहले रक्षा-सूत्र की अदला-बदली की थी। युद्ध के दौरान पोरस ने जब सिकंदर पर घातक प्रहार के लिए हाथ उठाया तो रक्षा-सूत्र को देखकर उसके हाथ रुक गए और वह बंदी बना लिया गया। सिकंदर ने भी पोरस के रक्षा-सूत्र की लाज रखते हुए उसका राज्य वापस लौटा दिया।

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बादशाह हुमायूं ने रानी कर्मवती के भाई का फर्ज निभाया

इसी तरह से बादशाह हुमायूं और कमर्वती की कथा है। मुगल काल में बादशाह हुमायूं चितौड़ पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ रहा था। ऐसे में राणा सांगा की विधवा कर्मवती ने हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा वचन ले लिया, फिर क्या था हुमायूं ने चितौड़ पर आक्रमण नहीं किया। यही नहीं आगे चलकर उसी राखी की खातिर हुमायूं ने चितौड़ की रक्षा के लिए बहादुरशाह के विरूद्ध लड़ते हुए कर्मवती और चित्तौड़ राज्य की रक्षा की।