
अखिलेश के खास सिपाही ने वेस्ट यूपी के गन्ना किसानों की अनदेखी को लेकर भाजपा पर दिया बड़ा बयान
मेरठ। कुछ दिन पहले गन्ना किसानों के लिए भाजपा सरकार ने 8,500 करोड़ रुपए के पैकेज आैर इसके बाद गन्ने के परामर्शी मूल्य में 20 रूपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की घोषणा की है। इसको गन्ना किसान और विपक्षी दल सरकार का किसानों के साथ धोखा बता रहे हैं। गन्ना पैकेज और परामर्शी मूल्य में 20 रूपये बढ़ोतरी की घोषणा को भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश से जुड़ी राजनीतिक संभावनाओं से जोड़ा जा रहा है। 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को अपने सहयोगी अपना दल के साथ मिलकर प्रदेश की कुल 80 में से 73 सीटों पर जीत हासिल हुई थी, लेकिन इस साल हुए तीनों लोकसभा उपचुनाव भाजपा हारी है।
अतुल प्रधान बोले- वेस्ट यूपी भाजपा की कब्रगाह बनेगा
समाजवादी पार्टी नेता अतुल प्रधान कहते हैं कि गन्ना किसानों पर सरकार दबाव बना रही है। सरकार का दबाव इस बात पर है कि 2019 में किसान गन्ने की फसल पैदा ही न करें। उन्होंने कहा कि किसानों से शपथ पत्र लिया जा रहा है। गन्ना सर्वे के नाम पर किसानों का विभाग शोषण कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस बाद गत वर्ष की अपेक्षा 15 प्रतिशत गन्ने की फसल अधिक हुई है। गन्ना किसानों को इस फसल के भरपूर दाम नहीं मिले। वहीं दूसरी ओर अब भाजपा सरकार गन्ना किसानों को पूरी तरह से दबाव में लेना चाहती है। अतुल प्रधान ने कहा कि सरकार की नीति गन्ना किसानों के खिलाफ है। भाजपा सरकार उपचुनाव में मिली हार से सकते में है। उन्होंने कहा कि पश्चिम का यही गन्ना किसान भाजपा सरकार की कब्र खोदेगा। वेस्ट यूपी ही भाजपा सरकार की कब्रगाह बनेगा।
पश्चिम में रहा है गन्ना राजनीतिक मुद्दा
वेस्ट यूपी को गन्ना बेल्ट भी कहा जाता है और यहां गन्ना बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहा है। उत्तर प्रदेश के तकरीबन आधी चीनी मिलें प्रदेश के पश्चिमी हिस्से में ही हैं और अधिकांश उत्पादन भी इसी हिस्से में है। चीनी उद्योग उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा संगठित उद्योग है। गन्ना किसान राजनीतिक दलों का भाग्य बनाते और बिगाड़ते रहे हैं। इसलिए भी राजनीतिक दल इससे भयभीत भी रहते हैं। गन्ना किसानों की जरा सी नराजगी दलों का पूरा समीकरण बिगाड़ देता है। इसके ताजा उदाहरण रालोद और उसके मुखिया अजित सिंह से बेहतर कौन हो सकता है।
2014 में भाजपा पर जताया था विश्वास
2014 के लोकसभा चुनावों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की अधिकांश लोकसभा सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की थी। उस वक्त भी गन्ना किसान परेशान थे। चीनी मिलों पर उनका बकाया काफी ज्यादा था। इस मुद्दे को भाजपा ने स्थानीय स्तर पर ठीक से उठाया और इसका फायदा पार्टी को मिला भी। इसके अलावा 2013 के दंगों के बाद धर्म के आधार पर हुए ध्रुवीकरण का फायदा भाजपा को मिला था। उसको अगड़ी जातियों के वोट तो मिले ही थे, साथ ही साथ उसने पिछड़ी जातियों में भी सेंध लगाई थी। यहां तक कि 2013 से मुस्लिम समाज के खिलाफ बने माहौल में कुछ जाट मतदाता भी भाजपा के पाले में गए थे, लेकिन अगर गन्ना किसानों का गुस्सा बढ़ता है तो भाजपा के लिए इस क्षेत्र में 2014 के प्रदर्शन को दोहरा पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा।
खुद को मजबूत करने में जुटी भाजपा
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट पर उपचुनाव में हार के बाद पार्टी के अंदर इस क्षेत्र में अपनी खुद को मजबूत करने के लिए लगातार सियासी दावपेंच चल रही है। कैराना उपचुनाव की हार की बाद पार्टी को स्थानीय नेताओं ने यह बताया कि गन्ना किसानों की नाराजगी हार की एक बड़ी वजह बनी। अब लोकसभा चुनाव में समय बहुत कम बचा है। एक तरह से इसका काउंटडाउन शुरू हो गया है। इसे देखते हुए पार्टी की ओर से केंद्र सरकार पर दबाव बनाया गया और आनन-फानन में गन्ना किसानों के लिए ये घोषणाएं की गई हैं। दरअसल, भाजपा ने 2017 के विधानसभा चुनावों के दौरान अपने घोषणापत्र में यह वादा किया था कि गन्ना किसानों को 14 दिनों के अंदर पैसे मिल जाएंगे, लेकिन यह वादा अधूरा रहा है और कैराना उपचुनाव में यह बड़ा मुद्दा बना भी था। अभी स्थिति यह है कि इस क्षेत्र के किसानों को फरवरी 2018 तक के पैसे का ही भुगतान हो पाया है। मई तक जिन किसानों ने गन्ना चीनी मिलों को दिया है, उनका मिलों पर बकाया शेष है।
Published on:
19 Jul 2018 01:16 pm
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