
लखनऊ के विवेक तिवारी से पहले मेरठ में थी एक स्मिता भादुड़ी, 18 साल में पुलिस अब भी वैसी, दोनों घटनाएं हुर्इ एक जैसी...
मेरठ। पिछले दो दिन में प्रदेश की राजधानी लखनऊ आैर मेरठ शहर के बीच अचानक लोग समानता खोजने लगे हैं। वजह एप्पल कंपनी के एरिया मैनेजर विवेक तिवारी पर पुलिसकर्मी द्वारा गोली चलाकर हत्या करना। यह ठीक उसी अंदाज में हुर्इ जिसमें मेरठ के दौराला क्षेत्र में पुलिस ने मेरठ कालेज में बीकाॅम के छात्र मोहित त्यागी आैर बीएससी फाइनल की छात्रा स्मिता भादुड़ी की कार के पीछे जीप लगा दी थी आैर अंधाधुंध गोलियां चलाकर स्मिता भादुड़ी को मौत के घाट उतार दिया था, इसमें मोहित घायल हो गया था। 14 जनवरी 2002 की शाम सात से पौने आठ बजे तक की उस घटना को लोग आज भी सुनते हैं तो उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। स्मिता की सुनकर अब लखनऊ के विवेक तिवारी की पुलिस गोली से हत्या से सभी हतप्रभ हैं। 18 साल में सबकुछ बदल गया है, लेकिन पुलिस जिस सोच के साथ फील्ड में उतरती है, वही सोच उसकी आज भी है। यह विवेक तिवारी हत्याकांड से साबित हो गया है।
मेरठ से विवेक आैर स्मिता का जुड़ाव
लखनऊ आैर मेरठ में पुलिस की गोली से हुर्इ दोनों हत्याआें में एक समानता यह भी है कि गोलियों का शिकार हुए विवेक व स्मिता दोनों मेरठ के स्टूडेंट रहे। पुलिस की गोली खाने से पहले स्मिता 2000 में बीएससी फाइनल वर्ष की छात्रा थी, तो विवेक तिवारी ने मेरठ के दीवान इंस्टीट्यूट से ही 2002 में एमबीए की पढ़ार्इ की थी। पुलिस ने दोनों पर गोलियां बिना कुछ सोचे-समझे चला दी। स्मिता के साथ उसके ही काॅलेज का साथी छात्र था, तो विवेक के साथ उसके साथ काम करने वाली पूर्व महिला कर्मचारी थी। 18 साल के अंतराल पर हुर्इ दोनों घटनाआें में पुलिस विभाग की कार्यशैली की सबसे ज्यादा समानताएं हैं।
18 साल पहले स्मिता की एेसे हुर्इ थी हत्या
14 जनवरी 2000की शाम मेरठ कालेज की बीएससी तृतीय वर्ष की छात्रा स्मिता भादुड़ी मेरठ के दौराला के सिवाया क्षेत्र मेें कार से अपने दोस्त के साथ जंगल में घूमने गई थी, लेकिन पुलिस ने बदमाश समझकर गोली मार दी। स्मिता की मौत हो गई लेकिन उसका साथी मोहित त्यागी बच गया। मोहित त्यागी की तहरीर पर दौराला के तत्कालीन इंस्पेक्टर अरुण कौशिक, कांस्टेबल भगवान सहाय और सुरेंद्र सिंह को नामजद किया गया था। 26 अप्रैल 2000 को यह केस सीबीआई ट्रांसफर कर दिया गया। सीबीआई ने जांच में एनकाउंटर को फर्जी पाया और 26 फरवरी 2004 को तीनों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी। मेरठ के थाना दौराला पुलिस को मुखबिर से 14 जनवरी 2000 को खबर मिली कि सिवाया के जंगल में मारुति कार में बदमाश हैं। सूचना मिलने पर थाना दौराला के तत्कालीन इंस्पेक्टर अरुण कौशिक, कांस्टेबल सुरेंद्र सिंह और भगवान सहाय के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए। उन्होंने जंगल में खड़ी कार पर फायरिंग कर दी, जिससे कार में बैठी स्मिता भादुड़ी की गर्दन और मोहित त्यागी की पीठ में गोली लगी। स्मिता भादुड़ी की मौके पर ही मौत हो गई। वहीं मोहित त्यागी गंभीर रूप से घायल हो गया। इसके बाद वायरलेस पर मेसेज जारी किया गया कि सिवाया के जंगल में बदमाशों से मुठभेड़ चल रही है। मेसेज सुनते ही पुलिस के उच्चाधिकारी मौके पर पहुंच गए। अधिकारियों को यह फर्जी मुठभेड़ का मामला लगा। उन्होंने घायल मोहित त्यागी को हॉस्पिटल में भर्ती कराया।
छात्र मोहित त्यागी की तहरीर पर मुकदमा
मुठभेड़ को फर्जी मानते हुए मोहित त्यागी की तहरीर पर इंस्पेक्टर अरुण कौशिक, कांस्टेबल भगवान सहाय और सुरेंद्र सिंह को नामजद कराया गया। दौराला क्षेत्र में मोदी रबर फैक्ट्री के एक अधिकारी की बेटी को पुलिस ने इसी तरह गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया था। इस कांड ने भी उत्तर प्रदेश पुलिस की खूब किरकिरी कराई थी। छात्र के पिता हाईकोर्ट गए तो मामले में दोबारा सीबीआइ जांच हुई। इस मामले में अरुण कुमार समेत तीन पुलिसकर्मियों को आजीवन कारावास की सजा हुई। वर्तमान में अरुण कुमार मेरठ जेल में बंद है। स्मिता भादुड़ी के पिता मोदीपुरम की न्यू बी-टाइप मोदी कालोनी में रहते थे। स्मिता की हत्या के बाद यह परिवार कुछ दिन तो मेरठ में रहा। इसके बाद परिवार दिल्ली चला गया था।
Published on:
30 Sept 2018 06:36 pm
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