
विंध्याचल मंदिर
सुरेश सिंह
मिर्ज़ापुर. विन्ध्य पर्वत पर विराजमान आदिशक्ति मां विंध्यवासिनी का मंदिर है। ऐसी मान्यता है कि भक्तों के कल्याण के लिए मां सिद्धपीठ विन्ध्याचल में सशरीर विराजमान रहती हैं। विंध्यवासिनी का धाम मणि द्वीप के नाम से भी विख्यात है। कहते हैं कि मां के धाम में दर्शन पूजन करने से भक्तों की सारी मनोकामनाए पूरी होती हैं। विन्ध्य पर्वत की विशाल श्रृंखला को विन्ध्याचल में ही गंगा स्पर्श करती है। इसी लिए हिन्दू धर्म मे विंध्यक्षेत्र का आध्यात्मिक तौर पर खास महत्व है। इसी स्थान पर आदिशक्ति माता विंध्यवासिनी अपने पूरे शरीर के साथ विराजमान है, जबकि देश के अन्य शक्ति पीठों पर सती के शरीर का एक-एक अंग गिरा है।
देश के तमाम स्थानों पर स्थित देवी के मंदिरों को शक्तिपीठ और विन्ध्याचल को सिद्धपीठ के नाम से जाना जाता है। यहा माता अपने तीनो रूप महालक्ष्मी, महाकाली व महासरस्वती के रूपों में तीन कोण पर विराजमान हो कर भक्तो को दर्शन देती है। तीनों देवियों के त्रिकोण का दर्शन व परिक्रमा का विशेष महात्म्य पुराणों में किया गया है। देश के कोने-कोने से आने वाले भक्त मां विंध्यवासनी के दर पर मत्था टेकते हैं साथ ही तीनों देवियों से बने त्रिकोण परिक्रमा करते हैं आदिकाल से ही यह त्रिकोण ऋषियों मुनियों के लिए सिद्धि पाने के लिए तप स्थली रहा है।
देवासुर संग्राम के दौरान ब्रह्मा, विष्णु व महेश ने माता के दरबार में तपस्या कर मां से वरदान मांग कर शक्ति प्राप्त किया था, त्रिकोण पथ पर पहली देवी है। मां विंध्यवासनी जिन्हें महालक्ष्मी के नाम से भी जाता जाता है उनकी पंचोपचार व षोडशोपचार विधि से पूजा की जाती है। आदिशक्ति माता विंध्यवासिनी मां की मार्कंडेय पुराण में महिमा का बखान करते हुए कहा गया है कि "यं यं चिन्त्यते कामं तं तं प्राप्नोति सर्वदा ......."।
भक्त जैसे-जैसे माता की आराधना करता हैं वैसे-वैसे उसकी मनोकामना सिद्ध होने लगती है। विन्ध क्षेत्र की महिमा अपार है, जिसका वर्णन देवता भी नही कर पाए,, वहीं त्रिकोण पथ की दूसरी देवी हैं मां काली जो की कालीखोह में विराजमान हैं। इन्हें महाकाली भी कहा जाता है, देश के तमाम मंदिरों में माता काली के सौम्य रूप का दर्शन मिलता है जबकि विन्ध्य पर्वत पर विराजमान मां काली आसमान की तरफ मुख खुले हुए दिव्य रूप का दर्शन मिलता है।
मान्यता है कि देवता देवासुर संग्राम में भयभीत होकर आदिशक्ति के शरण में आये उनकी पुकार सुनकर माता ने काली का रूप धर रक्तासुर का वध करने के लिए अपना खडग और खप्पर उठ लिया। रक्तासुर का रक्त धरती पर पड़ते ही असुरों की फ़ौज पैदा हो जा रही थी तो देवी ने अपने मुंह को विशाल आकर दिया। दोनों मुख फैलाकर नीचे वाले को धरती व ऊपर के हिस्से को आसमान से रूप दिया और देवी जिह्वा निकालकर रक्तासुर के रक्त का पान कर उस उसका वध किया। आज भी मां उसी रूप में काली खोह में विराजमान है।
माता काली के इस रूप का दर्शन करने से शत्रुओं पर विजय हासिल होती है। त्रिकोण पथ की सबसे अंतिम देवी हैं मां अष्टभुजा विंध्य पहाड़ पर गुफाओ में विराजमान मां अष्टभुजा को महा सरस्वती भी कहा जाता है। मान्यता है की यह भगवान कृष्ण की बहन हैं। जन्म के बाद जब क्रूर कंस ने इन्हें उठाकर पत्थर पर पटख़ने की कोशिश की तो वह कंस के हाथों से छूटकर आसमान के माध्यम से विंध्याचल विंध्य पर्वत पर गुफा में विराजमान हुई। देखने पर इनका मुख बच्चे की भांति नजर आता है। कहते हैं जो भी भक्त विंध्याचल दर्शन आये अगर वह त्रिकोण की परिक्रमा करे तो उन्हें दोगुना फल की प्राप्ति होती है।उसकी यात्रा सफल होती है।
Published on:
15 Oct 2018 11:43 am
बड़ी खबरें
View Allमिर्जापुर
उत्तर प्रदेश
ट्रेंडिंग
