
1998 - indian nuclear test in pokharan
भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण मई, 1974 में करके पूरी दुनिया को चौंका दिया था। इस परीक्षण का नाम स्माइलिंग बुद्धा (मुस्कुराते बुद्ध) रखा गया था। इसके ठीक 24 साल देश ने मई 1998 में 'पोखरण-2' फिर से दोहराया। इसके तहत पांच परमाणु बमों का परीक्षण किया गया था। ये परीक्षण 11 और 13 मई को किए गए थे। इनमें से जो पहला परीक्षण किया गया था, वह फ्यूजन बम था। वहीं, बाकी के चार विस्फोटक फिजन बम थे। इन परीक्षणों के बाद जापान, अमरीका सहित कई देशों ने भारत पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे।
11 मई, 1998 को एक फ्यूजन और दो फिजन बमों को फोडऩे के साथ 'ऑपरेशन शक्ति' की शुरुआत की गई। पोखरण-2 को यह कोड नाम दिया गया था। 13 मई को दो और फिजन बमों का परीक्षण किया गया। सभी परीक्षण भूमिगत किए गए थे। इसके तुरंत बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार ने संवाददाता सम्मेलन का आयोजन कर भारत को पूर्णतया रूप से परमाणु संपन्न देश घोषित कर दिया। परीक्षण में बमों का नाम 'शक्ति-1' से लेकर 'शक्ति-5' रखा गया था।
भारत का परमाणु बम कार्यक्रम
माना जाता है कि भारत का परमाणु कार्यक्रम 1944 में शुरू हुआ था जब परमाणु भौतिकविद् होमी भाभा ने परमाणु ऊर्जा के दोहन के प्रति भारतीय कांग्रेस को राजी करना शुरू कर दिया। एक साल बाद उन्होंने टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान (टीआईएफआर) की स्थापना की। वर्ष 1950 में प्रारंभिक अध्ययन बार्क में किया गया। इसके बाद प्लूटोनियम और बम के अन्य उपकरण बनाने के उपाय विकसित किए गए। वर्ष 1962 में उत्तरी सीमा में चीन के साथ युद्ध होने के कारण और फिर 1964 में चीन द्वारा परमाणु परीक्षण करने के कारण भारत को परमाणु बम बनाने की जरूरत और ज्यादा महसूस हुई।
1965 में लाल बहादुर के प्रधानमंत्री बनने और विक्रम साराभाई के परमाणु कार्यक्रम का प्रमुख बनने के बाद इस दिशा में काम की गति धीरे पड़ गई। 1966 में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री और भौतिकि राजा रमनना के साथ जुडऩे से परमाणु हथियार बनाने की प्रक्रिया ने गति पकड़ ली। चीन की ओर से एक और परमाणु हथियार का परीक्षण करने के बाद 1967 में भारत ने भी परमाणु हथियार बनाने की ठान ली और 1974 में केंद्र सरकार ने 'स्माइलिंग बुद्धा' के तहत पहला परमाणु परीक्षण किया।
अर्थशास्त्र में अमर्त्य सेन को मिला नोबेल पुरस्कार
अमर्त्य सेन का जन्म 3 नवंबर, 1933 को पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन में आशुतोष और अमिता सेन के घर हुआ था। रबिंद्रनाथ टैगोर ने ही अमर्त्य सेन को उनका नाम दिया था। सेन के पिता ढाका यूनिवर्सिटी में रसायन के प्रोफेसर थे और 1945 में वह परिवार के साथ पश्चिम बंगाल में आकर बस गए थे।
उन्होंने (अमर्त्य) ने 1940 में ढाका के सेंट ग्रेगोरी स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा शुरू की। इसके एक साल बाद 1941 में शांतिनिकेतन स्थित पाथा भवन स्कूल में दाखिला ले लिया। 1951 में उन्होंने कलकत्ता (अब कोलकाता) के प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला ले लिया जहां से उन्होंने बी ए (अर्थशास्त्र) में डिग्री हासिल की। कॉलेज में पढ़ाई करते वक्त उन्हें ओरल (मौखिक) केंसर हो गया था और डॉक्टरों ने कहा था कि उनके पास सिर्फ 15 प्रतिशत संभावना है कि वह 5 साल तक जी पाएंगे। हालांकि, विकिकरण चिकित्सा की मदद से वह अपनी बीमारी को मात देने में कामयाब रहे। 1953 में वह कैंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में दाखिला ले लिया और 1955 में उन्होंने अर्थशास्त्र में दूसरी बार डिग्री हासिल की।
करियर की शुरुआत
अमत्र्य सेन ने अपने करियर की शुरुआत एक शिक्षक और अनुसंधान विद्वान के तौर पर जाधवपुर विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग से की। 1960-61 में वह अमरीका में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी में विजिटिंग प्रोफेसर थे।
उन्होंने 1963 और 1971 के बीच दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में पढ़ाया। वर्तमान में वह हावर्ड यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक हैं। उन्हें 1998 में अर्थशास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1999 में भारत रत्न से नवाजे गए। 2012 में नेशनल ह्यूमेनिटिस मेडल प्रदान किया गया। 2017 में राजनीति शास्त्र के लिए उन्हें जॉन स्काइट पुरस्कार दिया गया। सेन भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह सहित कई अर्थशास्त्रियों के सलाहकार भी रह चुके हैं।
Published on:
14 Aug 2017 08:12 am
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