
नई दिल्ली। अहिस्ता चल जिंदगी अभी, कोई कर्ज चुकाना बाकी है, कुछ दर्द मिटाना बाकी है कुछ फर्ज निभाना बाकी है! सिर्फ बारह साल की उम्र में स्कूल में किताब पढने के बजाए दुखों की मार कोई झेले तो आप क्या कहेंगे? लेकिन किसी के लिए इस नाज़ुक उम्र में दुखों के मायने कुछ और ही थे। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेला करते हैं, उस उम्र में सयानी बन उन्हें अपने से 14 साल बड़े आदमी से शादी करने पर मजबूर किया गया। इसी उम्र से वैवाहिक बलात्कार झेलती रहीं। शादी के एक साल बाद ही प्रसव की पीड़ा उनपर आपदा बनकर बरसी। इतना सबकुछ एक कच्ची उम्र में होने के बावजूद भी कोई सांस लेता रहे और जीता रहे इससे बड़ी बहादुरी और क्या होगी। यह कहानी है झाडू-पोछा करने वाली एक महिला, बेबी हलदार की। जिसने अंगारों पर चलते हुए अपना जीवन बिताया। काम करते हुए अपनी कहानी लिखी जिसे लाखों लोगों के दिलों में जगह बनाई।
बिन मां की इस बच्ची को एक दरिंदे के रहमो-कर्म पर पलने के लिए छोड़ दिया गया। एक 14 साल बच्ची क्या जाने कि पति-पत्नी का संबंध क्या होता है। उनके साथ शारीरिक रिश्ते से मना करने पर भी जबरदस्ती की गई। 13 साल की उम्र में उससे बच्चे को जन्म देने पर मजबूर किया गया। शराब पीकर पति की मारपीट को 14 साल तक झेलती रहीं। जब दम घुटने लगा तो 25 साल की उम्र में तीन बच्चों के साथ घर छोड़ दिया। दिल्ली में काम मिलने के मकसद से भटकती रहीं। कभी-कभी ऐसा होता कि एक वक्त की रोटी भी नसीब ना होती। काम तलाशना चाहा, लेकिन अकेली महिला पर लोगों की गंदी नज़रें सौ दफा पड़ी। कितनी बार उसे काम के लिए घर बदलने पर मजबूर होना पड़ा।
अंततः एक महफूज़ घर की तलाश पूरी हो ही गई, जहां इज्जत से काम करके वह अपने बच्चे पाल सकती थीं। यह घर था मुंशी प्रेमचंद के पोते, प्रोफेसर प्रबोध कुमार का। जहां घर की झाड़ू-पोछा और खाना बनाने का काम उन्हें दिया गया। घर का पूरा काम बिना एक लफ्ज़ कहे करतीं, लेकिन जैसे ही घर में रखी किताबों का शेल्फ देखतीं तो ठहर जातीं। किताबें देख उनकी आँखों में अजब सी चमक आ जाया करती थी।
प्रोफेसर साहब की आंखों ने उनका मन टटोल लिया। तस्लीमा नसरीन की 'आमार मेयेबेला' वह पहली किताब थी, जिसमें उन्होंने रूचि दिखाई। वो कहती हैं कि "मेयेबेला पढ़ते हुए मुझे ऐसा लगता था कि मैं अपनी कहानी को बहुत तेज़ी से पढ़ रही हूं।" साउथ इंडिया की यात्रा पर जाने से पहले प्रोफेसर कुमार ने उन्हें पेन और पेपर का बंडल थमा दिया। उनसे कहा कि लिखना शुरू करें। उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई, उन जैसी कम पढ़ी-लिखी एक कामवाली आखिर क्या लिख सकती थी? यही सब अपने दिमाग में लेकर वह यात्रा पर निकलीं थीं और जो सवाल थे उनके दिमाग में वह थे अपने उस बचपन के बारे में जिसे उन्होंने कभी जिया ही नहीं? तेरह साल की उम्र में बच्चे को जन्म देते समय होने वाले असहनीय दर्द के बारे में? शरीर पर पड़े उन जख्मों के लिए जो शादी की सौगत क रूप में मिले? दिल को मज़बूत कर वह लिखने लगीं। कुछ दिन बाद उन्हें इस काम में आनंद मिलने लगा। एक अलग सुकून महसूस करती थीं वह जब किताब लिखा करती थीं। अब सब्जी काटने बैठती तो कॉपी साथ होती। कढ़ाई चढ़ाकर लिखने बैठ जातीं। बच्चों के सो जाने पर देर रात तक कलम से गुफ्तगू करतीं। इसी तरह उन्होंने अपना दिल खोलकर कागज़ पर रख दिया।
प्रोफसर कुमार जब वापस आए तब तक वह सौ पन्ने पूरे कर चुकी थीं। कागज़ के उस पोथे को पड़कर प्रोफसर साहब का दिल पसीज गया। उन्हें यकीन हो गया कि यह कहानी दुनिया को पता लगनी ही चाहिए। इस विषय में उन्होंने अपने दोस्त अशोक सेकरसिया और रमेश गोस्वामी से मदद ली। उनकी दास्तां को किताब का रूप दिया। नाम रखा 'आलो-आंधारि'। आने वाली मुश्किल थी, पब्लिशर ढूंढने की। एक छोटे पब्लिशिंग हाउस के मालिक संजय भारती ने अपने जोखिम पर उस किताब को छापने के लिए हाँ कर दिया। पहले दिन से ही किताब की धड़ल्ले से खरीदारी होने लगी। छोटे तबके से लेकर बड़े नामी लोगों ने उसे पसंद किया। मीडिया के बीच भी इस किताब को बहुत अच्छा रिसपोंस मिला। बेबी हलदार कहती हैं, "अपना पूरा जीवन किसी भयानक सपने के तौर पर जीने के बाद मेरे पास कुछ था, जे मेरी पहचान बनीं। वह है मेरी अपनी किताब"
आलो-आंधारि किताब को 2006 में बेस्ट सेलर का खिताब दिया गया था। आज यह किताब 21 भारतीय और 13 विदेशी भाषाओं में छप चुकी है। वो गुमनाम लड़की जिसके जीने-मरने से भी किसी को कोई फर्क न पड़ता था, अब लोगों के लिए एक मिसाल है। जाते-जाते बेबी हलदार की लिए एक पंक्ति याद आती है कुछ हसरतें अभी अधूरी हैं कुछ काम भी और ज़रूरी हैं जीवन की उलझ पहेली को पूरा सुलझाना बाकी है।
Published on:
24 Nov 2017 12:28 pm
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