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इंदौर कलेक्टर ऑफिस जीरो वेस्ट बना

इंदौर का कलेक्टोरेट परिसर जीरो वेस्ट बन गया है। यानी इस परिसर में निकलने वाले पूरे कचरे का निपटान यहीं पर किया जा रहा है। परिसर से नाममात्र का कचरा भी बाहर नहीं भेजा जा रहा है। गीले कचरे से यहां रोजाना करीब 20.25 किलोग्राम जैविक खाद बनाई जा रही है। यह कई मायनों में बहुत बड़ी उपलब्धि है। पहली इस मायने में कि देश में अपने तरह का यह पहला कलेक्टोरेट है, जहां कचरे को वहीं पर न सिर्फ खत्म करने बल्कि उससे ऊर्जा बनानेे का तंत्र विकसित किया गया है।

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प्रसंगवश. इंदौर.इंदौर का कलेक्टोरेट परिसर जीरो वेस्ट बन गया है। यानी इस परिसर में निकलने वाले पूरे कचरे का निपटान यहीं पर किया जा रहा है। परिसर से नाममात्र का कचरा भी बाहर नहीं भेजा जा रहा है। गीले कचरे से यहां रोजाना करीब 20.25 किलोग्राम जैविक खाद बनाई जा रही है। यह कई मायनों में बहुत बड़ी उपलब्धि है।

पहली इस मायने में कि देश में अपने तरह का यह पहला कलेक्टोरेट है, जहां कचरे को वहीं पर न सिर्फ खत्म करने बल्कि उससे ऊर्जा बनानेे का तंत्र विकसित किया गया है। दूसरा इस मायने में कि कचरे का किस्सा वहीं खत्म होने से कचरा उठाने, इसे बाहर ले जाकर इसका निस्तारण करने में हर साल जो लाखों रुपए खर्च होते हैं, वे नए स्वरूप में पूरी तरह बच जाएंगे। इस एक बड़ी शुरुआत के पहले कदम के रूप में भी देखा जा सकता है। स्वाभाविक तौर पर जब शहर में जिले के सबसे बड़े कार्यालय में इस तरह की शुरुआत हुई है, तो वह वहीं नहीं रुकने वाली है। भविष्य में इसे निचले क्रम के कार्यालयों व संस्थानों में भी लागू किया जाएगा।

यह कदम शहर को जीरो वेस्ट की ओर ले जाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा। इसका अर्थ यह भी होगा कि कचरे से जुड़ा शहर का हर साल का करोड़ों रुपए का खर्च बच जाएगा। इंदौर स्वच्छता की हैट्रिक लगा चुका है और लगातार चौथी बार नंबर वन बनने की दिशा में मजबूती से कदम बढ़ा चुका है। स्वच्छता इंदौर की आदत में शुमार हो चुकी है। इंदौर में ऐसे कदम उठे हैं, तो ये अन्य शहरों व राज्यों में फैलेंगे। इंदौर के लिए भी और कदम उठाए जाने की जरूरत है।

इंदौर में कलेक्टोरेट परिसर को प्लास्टिक मुक्त बनाने की दिशा में भी प्रयास चल रहे हैं। अब उसे इससे आगे बढक़र नए आयाम स्थापित करने और उन्हें लोगों, शहरों व प्रदेशों को अनुसरण के लिए प्रेरित करने की दिशा में काम करना होगा। जीरो वेस्ट के बाद जीरो एनर्जी की अवधारणा को साकर बनाना होगा, जिसमें अपनी बिजली की खुद की खपत के लिए सौर ऊर्जा का उत्पादन हो सकेगा। इससे न सिर्फ बिजली के मामले में भी हम आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को हासिल कर लेंगे, वरन अपने पर्यावरण को भी बेहतर करने की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे।