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Lockdown पर IIM-A का शोधः जरूरतमंदों तक राहत पहुंचाने में सरकारी हस्तक्षेप की सक्रियता जरूरी

भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद ( IIM Ahmedabad ) के शोधकर्ताओं की रिपोर्ट ( iim research )। लॉकडाउन ( coronavirus lockdown ) में वित्तीय मदद ( government funding ) ना मिलने से तमाम संगठनों-व्यक्तियों ने बंद किए राहत कार्य। प्रवासियों ( migrant labourers ) और जरूरतमंदों ( hungry people ) की पहुंच सार्वजनिक वितरण प्रणाली ( Public Distribution System ) तक नहीं थी।

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Hunger relief efforts need govt intervention actively IIMA report

Hunger relief efforts need govt intervention actively IIMA report

नई दिल्ली। कोरोना वायरस लॉकडाउन ( coronavirus lockdown ) के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में जरूरतमंदों ( hungry people ) को भोजन और कच्चा माल बांटने वाले कम से कम 20 फीसदी लोगों और संगठनों के मुताबिक, वो जिन लोगों की सेवा कर रहे थे उन्होंने सार्वजनिक वितरण प्रणाली ( Public Distribution System ) की मदद ही नहीं ली। उन्होंने ईशारा किया कि भूख से राहत के प्रयासों में सरकारी हस्तक्षेप ( government funding ) के अधिक सक्रिय होने आवश्यकता है।

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भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद ( IIM Ahmedabad ) के शोधकर्ताओं की एक टीम द्वारा इनमें से कम से कम आधे लोगों का सर्वेक्षण किया गया। इसमें पता चला कि केवल कुछ लोगों को ही राशन मिल सका है। ऐसे 100 से अधिक संगठनों और व्यक्तियों का सर्वेक्षण खाद्य की कमी और उनके सामने आने वाली चुनौतियों का आकलन करने के लिए किया गया था।

इस रिपोर्ट ( iim research ) में कहा गया, "सरकारों से बिना किसी वित्तीय सहायता के लोगों ने पहल की। सर्वे में हिस्सा लेने वाले अधिकांश लोगों ने बताया कि सरकारों से उन्हें बेहद सीमित समर्थन मिला, जो कर्फ्यू पास देने और भोजन की आवश्यकता वाले लोगों के क्षेत्रों की पहचान करने तक था। धन और कच्चे माल के रूप में सहायता नगण्य थी। ऐसे चार फीसदी से भी कम लोगों को सरकार की ओर से वित्तीय समर्थन मिला।"

यह रिपोर्ट आईआईएम अहमदाबाद के प्रोफेसर अंकुर सरीन, शोधकर्ता बियांका शाह, ईशु गुप्ता, करण सिंघल, श्रद्धा उपाध्याय और वैदेही परमेस्वरन द्वारा तैयार की गई है। इसमें आईआईएम की पूर्व शिक्षिका रीतिका खेरा और पूर्व छात्र संदीप सचदेवा का भी योगदान रहा।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अपर्याप्त वित्तीय मदद भूख से राहत के प्रयासों में जुटे संगठनों और व्यक्तियों के लिए एक बाधा बनी रही। 87 प्रतिशत से अधिक प्रतिभागियों ने दावा किया कि वित्तीय सहायता उनकी प्राथमिक चिंता थी और यही उन्हें राहत कार्यक्रम को निलंबित करने के लिए मजबूर भी कर सकती है। करीब 36 फीसदी ने राहत गतिविधियों को रोक दिया।

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सर्वेक्षण बताता है कि नागरिक समाज की प्रतिक्रिया कैसे त्वरित और समय पर थी और राहत की पहल उनके मौजूदा स्थानीय नेटवर्क पर सफलतापूर्वक बनाई गई थी। इसमें कहा गया है कि समुदाय के नेताओं और सदस्यों के साथ लाभार्थियों की पहचान करने और उन तक पहुंचने में बेहतरीन सहयोग था।

गौरतलब है कि बीते 25 मार्च से देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा के बाद से ही तमाम प्रदेशों-शहरों से प्रवासी ( migrant labourers ) मजदूरों-श्रमिकों का पलायन शुरू हो गया था। जबकि दिहाड़ी मजदूर समेत तमाम लोगों के सामने भूखे रहने का संकट मंडरा रहा था। ऐसे वक्त में देश भर के तमाम गैर सरकारी संगठनों, नागरिक समाज, व्यक्तियों-संस्थाओं ने आगे बढ़कर जरूरतमंदों की मदद की।


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