
नई दिल्ली। #MeToo अभियान दुनियाभर की महिलाओं को अपने साथ कुछ यूं जोड़ेगा कि महिलाऐं अपने साथ हुई ज्यादती का कुछ खुल कर बयान करने लगेंगी। इस बारे में दिल्ली की महिलाऐं भी मुखर होकर आपबीती बता रही हैं।
कभी डर से चुप रहना, तो कभी लोग क्या कहेंगे यह सोचकर। दोनों ही तरीके गलत हैं। इस बात का अहसास मुझे हमेशा से था। तभी तो लोगों को लगता था कि मैं लड़की होने के बावजूद ज्यादा मुंह खोलती हूं। मुझे अपनी हद में तमीज से रहना चाहिए ताकि कोई मेरे साथ भूल से भी बुरा न करें। मैं तो एक आज्ञाकारी बेटी की तरह इसी आदेश का पालन कर रही थी ताकि कोई मेरे साथ गलत न कर पाए। इसके बावजूद जब उस दिन किसी ने मेरे साथ बदतमीजी करने की कोशिश की, मैं खुद को रोक नहीं पाई। उसके बाद 10 मिनट के अंदर ही उसने मेरे साथ वह किया, जिसके अहसास से आज भी घृणा आती है। इस बात को 13 साल बीत चुके हैं, लेकिन जब भी उस जगह से गुजरती हूं, उस अंजान शख्स का ख्याल आ ही जाता है और बहुत बुरा महसूस होता है।
#MeToo दिल्ली का बदरपुर इलाका। उस दिन मैं गुडग़ांव से अपने हॉस्टल, जो कि फरीदाबाद और दिल्ली के बॉर्डर पर था, वहां लौट रही थी। बस में काफी भीड़ थी और मुझे अपनी सीट एक बुर्जुग महिला को महरौली के पास देनी पड़ी, इसलिए मैं खड़े होकर ही सफर कर रही थी।
खानपुर से एक लड़का बस में चढ़ा और मेरे पीछे आकर खड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद ही उसके हाथ मेरे कंधे पर लगे। मैंने उससे थोड़ा आराम से खड़े रहने को कहा। लेकिन वह समझने वालों में से नहीं था। बार-बार मेरी तरफ झुकने की कोशिश करता और मैं खुद को समेटती हुई उससे दूर खड़े होने की कोशिश करती। जब भीड़ थोड़ी और बढ़ी, उसने मौके का फायदा उठाते हुए मुझे जकडऩे की कोशिश की। तब मैं चीख पड़ी। मेरे चीखने से बस में मौजूद लोगों ने पूछा, क्या हुआ मैडम। मैंने बताया यह लड़का कब से मेरे साथ उल्टी-सीधी हरकतें करने की कोशिश कर रहा है। मैं कई बार इसे तमीज से रहने को कह चुकी हूं, पर इसे अपनी गलती का अहसास ही नहीं। मैं चलती बस में पागलों की तरह चिल्ला रही थी। इस बीच मथुरा रोड पर बस रुकी और वह लड़का बस के पीछे वाले रास्ते से उतर गया।
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यात्री मुझे शांत रहने को अभी कह ही रहे थे कि इतने में वह लड़का सामने के रास्ते से तेजी से चढ़ा और मुझे गंदे तरीके से छू कर दोगुनी तेजी के साथ बस से उतर कर भाग गया। जब तक मैं कुछ समझती, बस चल पड़ी और मेरी नजर उसे गुस्से से देखती रह गई। किसी तरह मैं हॉस्टल पहुंची और मुझे खुद से चिढ़ मच रही थी। लगा, जैसे अब मेरे जीवन का कोई मकसद नहीं। दो दिन तक मैं अपने कमरे में बंद रही और सिर्फ यह सोचती रही कि क्या मेरा कसूर सिर्फ इतना था कि मैंने गलत को गलत कहा और उसके खिलाफ आवाज उठाई? मेरी सोच अब भी वही है कि कब मर्दों को अपनी गलती का अहसास होगा और यौन हिंसा से महिलाओं को आजादी मिलेगी।

Published on:
17 Oct 2017 09:01 pm

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