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अनुशासन के पक्के थे बापू, जब अपने ही आश्रम में भोजन के लिए दूसरी लाइन में लगे

गांधी जी के मुताबिक जो नियम का पालन न करे, उसे दंड भी भोगना चाहिए। यह घटना नियम पालन के साथ ही उसमें समानता अपनाने पर बल देती है।

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अनुशासन के पक्के थे बापू, जब अपने ही आश्रम में भोजन के लिए दूसरी लाइन में लगे

नई दिल्ली। 2 अक्टूबर को देश महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मना रहा है। महात्मा गांधी ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में न सिर्फ योगदान दिया बल्कि उसकी स्पष्ट रूपरेखा भी तय की। गांधी जी ने देश में कई आंदोलन छेड़े जिनका असर देश से लेकर जनमानस पर दूर तक पड़ा। नतीजा देश ने आजादी की दहलीज पर न सिर्फ कदम रखा बल्कि एक सुनहरे भविष्य की नींव पर रखी। लेकिन ये सब गांधी जी के लिए इतना आसान नहीं था, इसके पीछे था उनका अनुशासन,दृढ संकल्प जिसके बूते उन्होंने अपनी सोच, इच्छा और जिद को सफलता में बदला। बापू की 150वीं जयंती के मौके पर हम बात करेंगे, कैसे बापू ने अनुशासन को कामयाबी का रास्ता बताया...


महात्मा गांधी अनुशासन के पक्के थे। वे जानते थे कि जीवन में सफलता की पहली सीढ़ी अनुशासन ही है। यही वजह है कि उन्होंने अपने जीवन में अनुशासन हर दम पालन किया। नियमों को मानने और उसके पालन करने में वे न तो अपने छोटे साथियों के आगे शर्माते थे और न ही बच्चों के आगे। उनके अनुशासन से जुड़े वैसे तो कई किस्से हैं जो ये बताते हैं कि नियमों से परे उन्होंने सोचना ही छोड़ दिया था। इन्हीं किस्सों में कुछ हम साझा कर रहे हैं...

साबरमती में सबकुछ नियम के मुताबिक
महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम में हर काम का समय नियत था और नियम-कायदों का सख्ती से पालन होता था। आश्रम के सभी कर्मचारी और वहां रहने यहां तक की आने वाले सभी लोगों को नियम के मुताबिक ही काम करने की हिदायत दी जाती थी।

भोजन के लिए दोबारा लाइन में लगे
साबरमती आश्रम का एक नियम यह था कि वहां भोजनकाल में दो बार घंटी बजाई जाती थी। उस घंटी की आवाज सुनकर आश्रम में रहने वाले सभी लोग भोजन करने आ जाते थे। जो लोग दूसरी बार घंटी बजने पर भी नहीं पहुंच पाते थे, उन्हें दूसरी पंक्ति लगने तक इंतजार करना पड़ता था। एक दिन भोजन की घंटी दो बार बज गई और गांधीजी समय पर उपस्थित नहीं हो सके। दरअसल वे कुछ जरूरी लेखन काम कर रहे थे, जिसे बीच में छोड़ना संभव नहीं था। जब वे आए, तब तक भोजनालय बंद हो गया था। ऐसे में नियम मुताबिक उन्हें दूसरी पंक्ति लगने तक इंतजार करना था।
हुआ भी ऐसा ही गांधी चुपचाप दूसरी पंक्ति लगने का इंतजार करने के लिए लाइन में लग गए। तभी किसी ने उनसे कहा- बापू! आप लाइन में क्यों लग रहे हैं? आपके लिए कोई नियम नहीं है। आप भोजन ग्रहण कीजिए। तब गांधीजी बोले- नहीं, नियम सभी के लिए एक जैसा होना चाहिए।

अनुशासन के साथ समानता पर जोर
गांधी जी के मुताबिक जो नियम का पालन न करे, उसे दंड भी भोगना चाहिए। यह घटना नियम पालन के साथ ही उसमें समानता अपनाने पर बल देती है। आमतौर पर हर संस्था कुछ तय नियमों के मुताबिक संचालित होती है। कनिष्ठ (छोटे) कर्मचारियों के साथ वरिष्ठ अधिकारियों के लिए भी नियम पालन की अनिवार्यता से ही संस्था की सुव्यवस्था और उन्नति निर्धारित होती है।