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26/11 हमला: कसाब को फांसी दिलाने में इस बच्ची ने निभाई अहम भूमिका, अब ऐसे गुजार रही जीवन

अचानक आतंकी कसाब द्वारा की जा रही अंधाधुंध गोलीबारी में एक गोली मेरे पैर में आकर धंस गई और उसके बाद में मुझे कुछ होश नहीं रहा।

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 Devika main witness of Kasab

नई दिल्ली। देश के इतिहास में हुए सबसे भयानक आतंकी हमले की आज बरसी है। 9 साल पहले आज ही के दिन मंबई में हुए 26/11 आतंकी हमले ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था। इस दौरान आतंकी संगठन लश्कर—ए-तैएबा के 10 आतंकी समुद्री रास्ते से मुंबई में घुसे और पूरी मुंबई को गोलियों की तड़तड़ाहट से गुंजा दिया। हमले में विदेशी नागरिक समेत 166 लोगों की मौत हो गई। जबकि कई लोग गंभीर रूप से घायल भी हो गए थे। इस हमले में भारत के हाथ केवल एक ही आतंकी अजमल कसाब लगा था कि जिसको 2012 में फांसी दे दी गई। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कसाब की पहचान हुई कैसे। दरअसल, उसकी पहचान करने वाला कोई और नहीं बल्कि एक बच्ची देविका रोटावन थी।

अभी तक सालता है दर्द

मुंबई हमले के चश्मदीदों में देविका उस समय सबसे कम उम्र की गवाह थी। मुंबई के सीएसटी रेलवे स्टेशन पर हुई गोलीबारी में उसके पैर में गोली लगी थी, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गई थी। आज जबकि घटना को 9 साल का समय बीत गया है। ऐसे में देविका के जख्म भले ही भर गए हैं, लेकिन उसका दर्द आज भी हरा है। हालांकि अब जब देविका 18 साल की हो चुकीं हैं, बावजूद इसके उन्हें हमले के मंजर आज तक ऐसे याद है, जैसे वो कल ही की बात हो।

हमले ने कर दिया अलग—थलग

उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को याद करते हुए देविका बताती हैं कि उस दिन मैं मेरा भाई और पिता मेरे बड़े भाई से मिलने के लिए पुणे जा रहे थे। तभी मैंने गोलियों की आवाज सुनी और देखा कि भगदड़ मची हुई थ्री। चीख-पुकार के दौरान लोग के ऊपर गिर रहे थे। तभी अचानक आतंकी कसाब द्वारा की जा रही अंधाधुंध गोलीबारी में एक गोली मेरे पैर में आकर धंस गई और उसके बाद में मुझे कुछ होश नहीं रहा। देविका के अनुसार उन्होंने कसाब को देखा था। पुलिस ने देविका को चश्मदीद गवाह बनाया और 10 जून को उसका बयान दर्ज कराया। देविका ने बताया कि इस दौरान उसको बहुत परेशानी झेलनी पड़ी। घटना का गवाह बनने के बाद वह अपने आप को समाज से अलग-थलग महसूस करने लगी। यहां तक कि कसाब से मेरा नाम इस कदर जुड़ गया कि लोग मुझे कसाब की बेटी कहकर बुलाने लगे। इसी का नतीजा है कि आज भी किसी कार्यक्रम के दौरान रिश्तेदार व परीचित उसको बुलाने से बचते हैं। लोगों को डर लगा रहता है कि ऐसा करने से कहीं उनको कोई परेशानी न उठानी पड़ जाए। यहां तक कि अपने ही गांव जाने पर उनको होटल में ठहरना पड़ता है।

आईपीएस बनना चाहती हूं

हालांकि हमले के बाद देविका की पढ़ाई में भी काफी दिक्कतें आई्ं। अब वह खूब पढ़तीं है और पढ़कर आईपीएस अधिकारी बनना चाहती हैं। वहीं कहती है कि पुलिस अफसर बनने के बाद आतंकियों को सफाया करना चाहती हूं।


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