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यूं ही नरोदा पाटिया दंगे को नहीं कहा जाता है नरसंहार, जानिए बड़ी वजह

साल 2002 में गोधरा ट्रेन कांड के अगले दिन अहमदाबाद के नरोदा पाटिया इलाके में एक दंगे की आग भड़की थी, जिसमें इलाके के 97 लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई।

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Shweta Singh

Apr 20, 2018

Naroda patiya massacre

नई दिल्ली। गुजरात हाई कोर्ट ने शुक्रवार 2002 के नरोदा पाटिया दंगे पर फैसला सुनाया। जिसके अनुसार बाबू बजरंगी को कोर्ट से राहत नहीं मिली। बता दें कि इस मामले में निचली अदालत ने बाबू बजरंगी के अलावा भाजपा के विधायक माया कोडनानी समेत 32 अन्य को दोषी करार दिया था। इस दंगे को नरसंहार का दर्जा दिया गया है। आइये जानते हैं इसके पीछे की कहानी..

साल 2002 में गोधरा ट्रेन कांड के अगले दिन अहमदाबाद के नरोदा पाटिया इलाके में एक दंगे की आग भड़की थी। इसमें इलाके के 97 लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई थी, साथ ही करीब 33 लोग घायल भी हुए थे। यह घटना उस दिन हुई जब विश्‍व हिन्‍दू परिषद (VHP) की तरफ से साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन को जलाए जाने के विरोध में बंद का आह्वान किया गया था। बंद में शामिल हुए नरोदा पाटिया इलाके की भीड़ ने उग्र रूप लेते हुए, वहां के अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों पर हमला बोल दिया।

ऐसे चला घटनाक्रम:-

25 फरवरी, 2002: अयोध्या के 2000 से ज्यादा कारसेवक साबरमती एक्सप्रेस से अहमदाबाद रवाना हुए।

27 फरवरी, 2002: गोधरा में 4 घंटे देरी से पहुंचने के बाद साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन का घेराव कर भीड़ ने आग के हवाले कर दिया। इस घटना में ट्रेन सवार 59 कारसेवकों की मौत हो गई।

28 फरवरी, 2002: साबरमती एक्सप्रेस के साथ हुए हादसे के बाद वीएचपी ने इसके खिलाड़ मोर्चा खोला और बंद का आह्वान किया। बंद के दौरान भीड़ ने उग्र रूप ले लिया और नरोदा पाटिया इलाके में हमला कर दिया।

2009 : इस घटना के बाद साल 2009 में इस मामले से जुड़ा मुकदमा शुरू हुआ। मामले में 62 आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। बता इनमें से 31 लोगों को दोषी करार दिया गया और 11 लोगों को मौत की सजा सुनाई गई। साथ ही इस मामले में 29 अन्य आरोपियों को बरी कर दिया था। गौरतलब है कि मामले की सुनवाई के दौरान 327 लोगों के बयान दर्ज किए गए थे। गवाहों में कई पीड़ितों समेत, डॉक्टर, पुलिस अधिकारी और साथ ही सरकारी अधिकारी शामिल थे। मामले की सुनवाई के दौरान ही एक अभियुक्त की मौत हो गई थी।

2012: इसके बाद करीब तीन साल बाद अगस्त 2012 में एसआईटी मामलों के लिए विशेष अदालत ने इस केस में 32 अन्‍य आरोपियों समेत बीजेपी विधायक और नरेंद्र मोदी की तत्कालीन राज्य सरकार की मंत्री माया कोडनानी और बाबू बजरंगी को हत्या और मामले का षड्यंत्र रचने का दोषी पाया।

2017 : दोषी पाए गए सभी आरोपियों ने विशेष अदालत के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। जिसके बाद इस मामले की सुनवाई जस्टिस हर्षा देवानी और जस्टिस ए.एस. सुपेहिया की पीठ ने की। मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद अगस्त 2017 में कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

2018: हाईकोर्ट ने शुक्रवार को इस मामले में फैसला सुनाया जिसमें माया कोडनानी को रहत मिली। उनके राहत के पीछे सबसे बड़ी वजह अमित शाह की गवाही मानी जा रही है। इसके अलावा बाबू बजरंगी उच्च न्यायालय से कोई राहत नहीं मिली। उनको दी गई जीवनपर्यन्त आजीवन कारावास की सजा अब भी बरकार है। साथ ही मामले में 7 अन्य आरोपियों को 21 साल के आजीवन कारावास की सजा और 14 लोगों को साधारण आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।


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