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नरोदा पाटिया मामले में बाबू बजरंगी को उम्रकैद की सजा, माया कोडनानी बरी

नरोदा पाटिया नरसंहार केस में बाबू बजरंगी को कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। वहीं, माया कोडनानी को बरी कर दिया है।

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नई दिल्ली। गुजरात में 2002 में हुए नरोदा पाटिया नरसंहार केस में गुजरात हाईकोर्ट का फैसला आ गया है। मामले में बाबू बजरंगी को हाई कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली है।

फैसले में आरोपी बाबू बजरंगी को दोषी करार दिया गया है। बाबू बजरंगी को कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। वहीं, पूर्व मंत्री माया कोडनानी को इस मामले में निर्दोष बताते हुए बरी कर दिया है।

बाबू बजरंगी के अलावा नरोदा पाटिया नरसंहार केस में आरोपी किशन कोरणी, मुरली नारणभाई सिंधी और सुरेश लंगाडो को भी दोषी करार दिया गया है। वहीं, विक्रम छारा और गणपति छानाजी छारा को निर्दोष करार दिया गया है।

ये था मामला
बता दें कि गोधरा ट्रेन कांड के अगले दिन 28 फरवरी 2002 को अहमदाबाद के नरोडा पाटिया इलाके में भडक़े दंगे में 97 लोगों की हत्या कर दी गई थी। वहीं कई अन्य घायल हो गए थे।
इस मामले में अगस्त 2012 में विशेष अदालत ने इस मामले में राज्य की पूर्व मंत्री डॉ माया कोडनानी को 28 वर्ष की कैद, विहिप नेता बाबू बजरंगी को आजन्म कैद, आठ को 31 वर्ष की कैद तथा 22 को 14 वर्ष की उम्र कैद उम्र कैद की सजा सुनाई थी। वहीं इसी मामले में 29 अन्य को बरी कर दिया गया था।

दोषियों, सरकार, पीडि़तों, एसआईटी ने की थी अपील याचिकाएं

इस मामले में इन सभी दोषियों के साथ-साथ राज्य सरकार, मामले की जांच करने वाले एसआईटी, पीडि़तों ने एक दर्जन अपील याचिकाएं दायर की हैं। दोषियों ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी है। वहीं राज्य सरकार के साथ-साथ मामले की जांच करने वाले विशेष जांच दल (एसआईटी) व पीडि़तों ने भी अपील याचिका दायर की है। राज्य सरकार, एसआईटी व पीडि़तों ने इस मामले में बरी को सजा दिए जाने तथा और दोषियों को ज्यादा सजा दिए जाने को लेकर अपील याचिका दायर की है।

तीन खंडपीठ ने सुनवाई से किया था इनकार

न्यायाधीश देवाणी की अध्यक्षता वाली खंडपीठ से पहले तीन खंडपीठों ने इस मामले में अपील याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार किया था। पहले न्यायाधीश के. एस. झवेरी व न्यायाधीश जी. बी. शाह, इसके बाद न्यायाधीश एम आर. शाह व न्यायाधीश के. एस. झवेरी तथा इसके बाद न्यायाधीश अकील कुरैशी व न्यायाधीश बीरेन वैष्णव की खंडपीठ ने इस मामले में सुनवाई से इनकार किया था।


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