13 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

अपने काम के साथ-साथ इन बातों को लेकर भी चर्चा में है ‘एनआईए’

आतंकवाद से निपटने के लिए नौ साल पहले बनाई गई राष्ट्रीय जांच एजेंसी के पास जांच के लिए बहुत कम मामले आते हैं।

4 min read
Google source verification
nia

नई दिल्‍ली। करीब नौ साल पहले राष्‍ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) का गठन आतंकवादी घटनाओं की गंभीर और वैज्ञानिक जांच के लिए हुआ था। ताकि हर मामला उचित अंजाम तक पहुंचे। इस एजेंसी की जिम्‍मेदारी ये भी है कि वो इस बात को सुनिश्चित करे कि हर मामले की सुनवाई तेज और असरदार तरीके से हो। इसे जांच में राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों और दूसरी जांच एजेंसियों के सहयोग लेने का अधिकार है। लेकिन एजेंसी अन्‍य सभी एजेंसियों के साथ तालमेल बिठाने में विफल रही। परिणाम यह निकला कि एनआईए विवादास्‍पद जांच के साथ टकराव को लेकर चर्चा में रहने लगी है। मक्‍का मस्जिद मामले में कुछ इस तरह के सवाल उठने के पीछे मुख्‍य वजह भी यही है।

1. सबसे बड़ी समस्‍या- काम का टोटा
एनआईए का गठन नौ साल पहले हुआ था। एनआईए के पास लगभग 800 लोगों का अमला है। एनआईए के पास पुराने मामलों के अलावा नए मामले बहुत कम आते हैं। इसलिए एजेंसी ने गृह मंत्रालय से गुजारिश की है कि उसे जांच के लिए कुछ नए मामले दिए जाएं। आपको बता दें कि एनआईए का गठन अमरीका की एफबीआई की तर्ज पर 2008 में मुंबई पर हुए आतंकी हमले के बाद एक विधेयक लाकर किया गया था। इसका मकसद एक केंद्रीय जांच एजेंसी की तरह आतंकवाद पर रोक लगाने की थी। जांच तेजी से करने के लिए इसे अलग फंड से लेकर विशेष अदालतों तक कई अधिकार दिए गए। लेकिन नौ साल बाद भी एनआईए के पास नए मामले न के बराबर हैं।

2. गठन के बाद से उठने लगे थे सवाल
इस जांच एजेंसी पर गठन के बाद से ही सवाल उठने लगे थे। एनआईए के पैरोकार और तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम पर आरोप लगे थे कि आतंकी मामलों की जांच में एजेंसी की भूमिका को लेकर उन्होंने कोई स्पष्टता नहीं रखी है। 2011 में दिल्ली हाईकोर्ट के सामने हुए एक बम धमाके की जांच एनआईए को देने पर इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व संयुक्त निदेशक एमके धर का बयान आया था कि चिदंबरम ने एनआईए तो खड़ी कर दी है लेकिन इस संस्था के अधिकारियों को स्थानीय स्थितियों के बारे में कितना पता होता है? उनके पास कोई जादू है क्या? दिल्ली पुलिस को आप इसकी जांच क्यों नहीं करने देते जो जमीनी हकीकत से कहीं ज्यादा वाकिफ है? तत्‍कालीन दिल्ली पुलिस के पूर्व आयुक्त अजय राज शर्मा ने कहा था कि आतंक को नियंत्रित करने के लिए प्रतिक्रियात्मक रिएक्टिव एक्‍शन की आवश्‍यकता है। इसके लिए प्रोएक्टिव पुलीसिंग की जरूरत है। एनआईए एक रिएक्टिव संगठन तो है पर वह सिर्फ जांच करता ह। इसलिए वो आतंक को दूर नहीं कर सकता।

3. जसोला में हेडक्‍वार्टर बनाना
एजेंसी को लेकर सरकार की गंभीरता पर तब भी सवाल उठे जब इसका दफ्तर दिल्ली की सीमा पर बसे एक इलाके जसोला में बनाया गया। इस निर्णय को अतार्किक माना गया। ऐसा इसलिए कि एजेंसी के अधिकारियों को अक्‍सर गृह मंत्रालय जाना होता है लेकिन दूरी और ट्रैफिक के चलते उन्हें दो-दो घंटे तक लग जाते थे। जाम की वजह से नॉर्थ ब्लॉक या मुख्य दिल्ली आने के नाम से ही एनआईए के अधिकारियों के हाथ-पैर ठंडे हो जाते थे। एजेंसी के बार-बार कहने के बाद उसे गठन के चार साल बाद 2013 में जाकर गृह मंत्रालय के पास जयसिंह रोड पर शिफ्ट किया गया।

4. स्‍थानीय पुलिस से टकराव
एनआईए की स्थानीय पुलिस के साथ टकराव की खबरें भी आती रहती हैं। जनवरी, 2015 में एनआईए और दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के बीच भिड़ंत सुर्खियां बनीं थीं। यह मामला कथित आतंकवादी लियाकत शाह की गिरफ्तारी से जुड़ी थी। एनआईए ने मामले की चार्जशीट में स्पेशल सेल के अफसरों के नाम लिखकर उन पर फर्जी गिरफ्तारी करने और सबूत प्लांट करने के गंभीर आरोप लगाए थे। इस मामले में स्पेशल सेल का कहना था कि उसके द्वारा दिए गए सबूतों को दरकिनार करते हुए एनआईए उल्टे उसे फंसाने का ही काम कर रही है। लियाकत शाह को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने 2013 में गिरफ्तार किया था। यह मामला बाद में एनआईए को दे दिया गया था जिसने बाद में अपने आरोपपत्र में कहा कि शाह बेकसूर है और दिल्ली पुलिस उसे फंसा रही थी।

5. एनआईए को जांच देने से बचती हैं राज्‍य सरकारें
ऐसा नहीं है कि देश में आतंकी घटनाएं हो नहीं रहीं हैं। राज्य सरकारें इन मामलों की जांच एनआईए को नहीं देना चाहतीं। इसके पीछे का कारण उनका यह डर बताया जाता है कि ऐसा करने से उनका रिकॉर्ड खराब होगा। हालांकि एनआईए एक्ट में यह प्रावधान है कि गृह मंत्रालय आतंक से जुड़े किसी भी मामले की जांच राज्य सरकारों की सहमति के बगैर भी एनआईए को दे सकता है। 2014 में पश्चिम बंगाल के बर्धमान में हुए बम धमाके का मामला उसका उदाहरण है। इस मामले की जांच का जिम्‍मा ममता बनर्जी सरकार की असहमति के बावजूद एनआईए को दी गई। केन्‍द्र के इस निर्णय को एक अपवाद माना गया। अन्‍य मामलों में राज्यों के साथ टकराव की आशंका के चलते केंद्र सरकार इसने बचने की ही कोशिश करती है।

6. नौ साल में एनआईए के पास केवल 196 मामले
पिछले नौ सालों में एनआईए के पास कुल 196 मामले सामने आए हैं। इनमें से आठ असम के बोडो प्रभुत्व वाले इलाकों में हुई घटनाओं से जुड़े हैं जबकि एक प्रमुख मामला छत्तीसगढ़ की जीरम घाटी में हुए माओवादी हमले का है। पठानकोट मामले की जांच एनआईए को दी गई थी। इसके अलावा अन्‍य केसेज हैं। एनआईए को करीब एक दर्जन मामलों में केस को सॉल्‍व करने में सफलता मिली है। एनआईए के अधिकारियों की मानें तो इन सारे ही मामलों में जगजाहिर है कि उनके पीछे कौन है? उनके मुताबिक ऐसे मामलों में उनका काम सिर्फ बिंदु जोड़कर एक रिपोर्ट बनाने तक सीमित हो जाता है क्योंकि उन्हें मालूम है कि इन मामलों के ज्यादातर आरोपी कभी नहीं पकड़े जाएंगे। बाकी मामले ऐसे हैं जिनमें एजेंसी की जांच पूरी हो चुकी है या होने की राह पर है। इसलिए नए मामले न आने की वजह से उसके पास कोई खास काम नहीं बचा है।

7. एनआईए क्‍या है?
इस पूरा नाम राष्‍ट्रीय जांच अभिकरण (एनआईए) है। यह भारत में आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए भारत सरकार द्वारा स्थापित एक संघीय जांच एजेंसी है। यह आतंकवाद विरोधी कानून प्रवर्तन एजेंसी के रूप में काम करती है। इस एजेंसी के पास राज्यों से विशेष अनुमति के बिना भी राज्यों में आतंक संबंधी अपराधों से निपटने का अधिकार है। एजेंसी 31 दिसम्बर, 2008 को भारत की संसद द्वारा पारित अधिनियम राष्ट्रीय जांच एजेंसी विधेयक 2008 के लागू होने के साथ अस्तित्व में आई थी।
सवाल क्‍यों ?