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पोरबंदरः यहां पैदा हुए थे महात्मा गांधी, जानिए आज क्या है हकीकत

अब जब देश में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मनाने की तैयारी चल रही है तो यह देखना बेहतर रहेगा कि उनसे जुड़े स्थल आज कैसे हैं। पत्रिका संवाददाताओं और स्रोतों के हवाले से पेश है ग्राउंड जीरो रिपोर्ट।

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Mahatma Gandhi Birth Place

Mahatma Gandhi birth place

पोरबंदर। भारतीय मिट्टी में हजारों रत्न ऐसे जन्मे हैं, जिन्होंने देश को गढ़ा है। उन्हीं में शामिल हैं महात्मा गांधी। अब जब देश में उनकी 150वीं जयंती मनाने की तैयारी चल रही है तो यह देखना बेहतर रहेगा कि उनसे जुड़े स्थल आज कैसे हैं। पत्रिका संवाददाताओं और स्रोतों के हवाले से पेश है ग्राउंड जीरो रिपोर्ट।

महात्मा गांधी की जन्मस्थली पोरबंदर किसी तीर्थ से कम नहीं है। महात्मा गांधी ने यहां जिस घर में जन्म लिया था, उसे राष्ट्रीय स्मारक बनाकर कीर्ति मंदिर का रूप दिया गया है। तीन मंजिला हवेली है, जिसमें 2 अक्टूबर 1869 को गांधी का जन्म हुआ। उनसे जुड़े दुर्लभ छायाचित्र, काम में ली गई वस्तुएं और विशाल पुस्तकालय यहां प्रदर्शित हैं।

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गांधी जी के प्रपितामह हरजीवन लाल गांधी ने समुद्र तट से महज 550 मीटर दूर स्थित इस इमारत को स्थानीय महिला से 250 वर्ष पहले खरीदा था। कीर्ति मंदिर पोरबंदर के भीड़ वाले इलाके में है। कहने को तो यहां एकतरफा यातायात रहता है, लेकिन संकरे इलाके में वाहनों की रेलमपेल थमने का नाम नहीं लेती। पुराने भाटिया बाजार में कस्तूरबा मार्ग पर कीर्ति मंदिर स्थित है। पोरबंदर की आबादी 2.25 लाख हो चुकी है। यहां से राजकोट 180 किलोमीटर, अहमदाबाद 400 किमी., द्वारका 105 किमी. दूर है। यहां रोज 200 से 400 लोग दर्शन के लिए आते हैं।

कस्तूरबा यानी महात्मा गांधी की पत्नी का घर भी कीर्ति मंदिर के पीछे है। कीर्ति मंदिर को कस्तूरबा के आवास से जोड़ दिया गया है। पर्यटकों को गंदगी भरे माहौल से गुजरना पड़ता है। लंबे-चौड़े परिसर में शौचालय तक नहीं है। वैसे इस भवन को कीर्ति मंदिर का रूप देने में सरकार का नहीं, बल्कि स्थानीय कारोबारी नानजी भाई कालिदास मेहता का योगदान था।

उन्होंनेे बापू के इस अनमोल निवास को खरीद कर आज का रूप दिया और सरकार को समर्पित कर दिया। सरदार पटेल ने 27 मई 1950 को इसका लोकार्पण किया था। गांधी स्मारक में रोज शाम 5 बजे गांधी का प्रिय भजन वैष्णव जन तो तेने रे कहिए... गाया जाता है।

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देश की सत्ता पर कोई भी काबिज हो, बापू की समाधि राजघाट, नई दिल्ली जाकर जरूर नमन करता है, लेकिन बापू और कस्तूरबा के जन्मस्थलों की थोड़ी सुध भी इसीलिए ली जा रही है, क्योंकि वर्ष 2019 बापू के जन्म का 150वां साल है। नहीं तो यहां सब-कुछ वैसा ही है, जैसा पचास बरस पहले होगा। कीर्ति मंदिर की इस अनदेखी को देखकर लगता है कि क्या बापू का नाम सिर्फ राजनीतिक औजार बन कर रह गया।


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