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विश्‍व मानवतावादी दिवस: रवींद्रनाथ टैगोर नोबेल पुरस्‍कार पाने वाले एशिया के पहले व्‍यक्ति

रवींद्रनाथ अपने माता-पिता की तेरहवीं संतान थे। बचपन में उन्‍हें प्‍यार से रबी बुलाया जाता था।
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Dhirendra Kumar Mishra

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Updated: 19 Aug 2018, 12:14 PM IST

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विश्‍व मानवतावादी दिवस: रवींद्रनाथ टैगोर नोबेल पुरस्‍कार पाने वाले एशिया के पहले व्‍यक्ति

नई दिल्‍ली। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित रवींद्रनाथ टैगोर ऐसे मानवतावादी विचारक थे, जिन्‍होंने साहित्य, संगीत, कला और शिक्षा के क्षेत्र में असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया। टैगोर और महात्मा गान्धी के बीच राष्ट्रीयता और मानवता को लेकर हमेशा वैचारिक मतभेद रहा। जहां गान्धी पहले पायदान पर राष्ट्रवाद को रखते थे, वहीं टैगोर मानवता को राष्ट्रवाद से अधिक महत्व देते थे। यही कारण है कि टैगोर को नोबेल पुरस्‍कार मिल गया और गांधी उससे वंचित रह गए। लेकिन दोनों एक दूसरे का बहुत अधिक सम्मान करते थे।

टैगोर ने दिया था गांधी को महात्‍मा की उपाधि
आपसी मतभेदों के बावजूद टैगोर ने गांधी जी को महात्मा का विशेषण दिया था। एक समय था जब शांति निकेतन आर्थिक कमी से जूझ रहा था और गुरुदेव देश भर में नाटकों का मंचन करके धन संग्रह कर रहे थे। उस समय गांधी जी ने टैगोर को 60 हजार रुपए के अनुदान का चेक दिया था।

एशिया के प्रथम व्‍यक्ति
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का जन्‍म 7 मई, 1861 को कोलकाता में हुआ था। आठ वर्ष की उम्र में उन्‍होंने अपनी पहली कविता लिखी। सोलह साल की उम्र में उन्‍होंने कहानियां और नाटक लिखना प्रारंभ कर दिया था। रवींद्रनाथ टैगोर एशिया के प्रथम व्‍यक्ति थे, जिन्‍हें नोबल पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया था। रवींद्रनाथ टैगोर ने साहित्य के क्षेत्र में अपूर्व योगदान दिया और उनकी रचना गीतांजलि के लिए उन्हें साहित्य के नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया था। वे विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के एकमात्र नोबल पुरस्कार विजेता हैं। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नई जान फूंकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं।

दो देशों ने बनाया अपना राष्‍ट्रगान
रवींद्रनाथ टैगोर दुनिया के संभवत: एकमात्र ऐसे कवि हैं, जिनकी रचनाओं को दो देशों ने अपना राष्ट्रगान बनाया। रवींद्रनाथ टैगोर को प्रकृति का सानिध्य काफी पसंद था। उनका मानना था कि छात्रों को प्रकृति के सानिध्य में शिक्षा हासिल करनी चाहिए। अपने इसी सोच को ध्यान में रख कर उन्होंने शांति निकेतन की स्थापना की थी।

कोलकाता तक सीमित रहा दायरा
51 की उम्र तक उनकी सारी उप‍लब्धियां कोलकाता और उसके आसपास के क्षेत्र तक ही सीमित रही। 51 वर्ष की उम्र में वे अपने बेटे के साथ इंग्‍लैंड जा रहे थे। समुद्री मार्ग से भारत से इंग्‍लैंड जाते समय उन्‍होंने अपने कविता संग्रह गीतांजलि का अंग्रेजी अनुवाद करना प्रारंभ किया। आज उनकी रचना रवींद्र संगीत बांग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग बन गया है। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत से प्रभावित उनके गीत मानवीय भावनाओं के विभिन्न रंग पेश करते हैं।

दर्जनों देश की यात्राएं की
रवींद्रनाथ ने अमरीका, ब्रिटेन, जापान, चीन सहित दर्जनों देशों की यात्राएं की थी। बचपन से कुशाग्र बुद्धि के रवींद्रनाथ ने देश और विदेशी साहित्य, दर्शन, संस्कृति आदि को अपने अंदर समाहित कर लिया था। सात अगस्त 1941 को गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का देहावसान हो गया।