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छत्रपति शिवाजी जयंतीः मुगलों के दांत खट्टे कर पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नीव रखी

Highlights पराक्रम, शौर्य और कुशल युद्ध नीति के बल पर मुगलों के छक्के छुड़ा दिए थे। छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 में महाराष्ट्र के शिवनेरी दुर्ग में हुआ था।

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Shivaji Maharaj

छत्रपति शिवाजी महाराज

नई दिल्ली। भारतीय इतिहास में वीर सपूत और मराठा समाज का गौरव कहे जाने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज (Chhatrapati Shivaji Maharaj) की 19 जनवरी 2021 को जयंती है।

छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती पर हर साल शोभा यात्रा निकाली जाती है,लेकिन इस बार कोरोना वायरस के कारण शोभा यात्रा नहीं निकालने का निर्णय लिया है। जयंती समारोह बूढ़ेश्वर मंदिर सभागृह में संपन्न किया जाएगा। छत्रपति शिवाजी एक महान देशभक्त होने के साथ कुशल प्रशासक भी थे।

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शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 को मराठा परिवार में शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। इसके साथ कुछ लोग उनका जन्म 1627 में भी बताते हैं।

पिता शाहजी भोसले थे सेनापति

शिवाजी के पिता शाहजी भोसले सेना में सेनापति थे। उनकी माता जीजाबाई धार्मिक स्वभाव की थीं। शिवाजी का पालन-पोषण धार्मिक ग्रंथों के साथ हुआ है।

माता जीजाबाई का धार्मिक स्वभाव होने के साथ व्यवहार से वीरंगना नारी थीं। उनके अंदर बचपन से ही शासक वर्ग की क्रूर नीतियों के खिलाफ लड़ने की ललक थी। वहीं दादा कोणदेव के संरक्षण में शिवाजी सभी तरह के युद्ध विधाओं में निपुण बने थे।

1674 में उनका हुआ था राज्याभिषेक

शिवाजी महाराज वीर थे उनकी बहादुरी के किस्से आज भी लोगों के प्रेरणादायक हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज मराठा थे और, सन (1630-1680) भारत के राजा एवं रणनीतिकार थे। उन्होंने 1674 में पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखी।

सन 1670 में छत्रपति शिवाजी ने मुगलों को नाकों चने चबवा दिए थे। उन्होंने मुगलों को हराकर सिंहगढ़ के किले पर फतह हासिल की थी। मुगलों की सेना के साथ उन्होंने जमकर लोहा लिया था। उन्होंने कई साल औरंगजेब के मुगल साम्राज्य से संघर्ष किया। सन 1674 में रायगढ़ में उनका राज्याभिषेक किया गया और वे छत्रपति बने। शिवाजी ने सुसंगठित प्रशासनिक इकाइयों की मदद से योग्य और प्रगतिशील प्रशासन दिया।

मराठा साम्राज्य की रखी थी नींव

1674 में उन्होंने ही पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखी। छत्रपति शिवाजी का संघर्ष औरंगजेब जैसे शासकों और उसकी छत्रछाया में पलने वाले लोगों की कट्टरता और उद्दंडता के विरुद्ध था।


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