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खुलासा: 88 फीसदी हिंदीभाषी नहीं बोल पाते हैं कोई दूसरी भाषा, उर्दू-पंजाबी बोलने वाले सबसे आगे

जनगणना के ताजा आंकड़ों में इसका खुलासा हुआ कि देश में हिंदी बोलने वाले 52 करोड़ लोगों में से सिर्फ 12 फीसदी (3.2 करोड़) ही कम से कम दो भाषाएं बोल पाते हैं।

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खुलासा: 88 फीसदी हिंदीभाषी नहीं बोल पाते हैं कोई दूसरी भाषा, उर्दू-पंजाबी बोलने वाले सबसे आगे

नई दिल्ली। भाषा किसी भी जीव-जन्तु के लिए आवश्यक है। भाषा वह साधन है जिसके द्वारा हम अपने विचारों को व्यक्त करते। कोई द्विभाषी होता है तो कोई बहुभाषी। देश में भाषा बोलने वालों की बात करें तो भारत में हिंदी या बांग्ला बोलने वालों (मातृभाषा) की दूसरी भाषाओं पर सबसे कम पकड़ है। जनगणना के ताजा आंकड़ों में इसका खुलासा हुआ है। सबसे आश्चर्यजनक है कि देश में हिंदी बोलने वाले 52 करोड़ लोगों में से सिर्फ 12 फीसदी (3.2 करोड़) ही कम से कम दो भाषाएं बोल पाते हैं। यानी हिंदी बोलने वाले 88 फीसदी लोग कोई दूसरी भाषा नहीं बोल पाते हैं जबकि सिर्फ 1 फीसदी हिंदीभाषी ही तीन भाषाओं के जानकार हैं।

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कम आबादी वाले क्षेत्रीय समूह बेहतर
खास इलाकों तक सीमित क्षेत्रीय भाषाओं के छोटे समूह अधिक भाषाएं बोलने में सक्षम पाए गए। 82 फीसदी कोंकणी और 79 फीसदी सिंधी एक से अधिक भाषाओं के जानकार हैं।
52 फीसदी शहरी युवा बोलते हैं एक से ज्यादा भाषाएं
युवा भारत अपनी पुरानी पीढ़ी के मुकाबले अधिक भाषाएं बोलता है। यहां 15 से 49 साल की उम्र की शहरी आबादी 2 भाषाएं बोलती हैं। इसके अलावा हर छठा व्यक्ति तीन भाषाएं बोलता है। शहरी और ग्रामीण भारत में बड़ा अंतर देखने को मिला है। ग्रामीण भारत में 22 फीसदी दो भाषाएं बोलते हैं और 5 फीसदी लोग 3 भाषाएं बोलते हैं।

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उर्दू बोलने वाले हैं आगे
सिर्फ उर्दू और पंजाबी भाषा बोलने वाले ही देश में ऐसे हैं जिनकी आधी से अधिक आबादी दो भाषाएं बोल सकती हैं। उर्दू बोलने वाले 62 फीसदी द्वि-भाषी हैं। पंजाबी बोलने वाले 53 फीसदी एक से अधिक भाषाएं बोल सकते हैं।

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