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इस गांव में जाने के बाद बापू ने चरखा कातने और वस्‍त्र त्‍याग का लिया था फैसला

बिहार के इस गांव की गरीबी ने गांधी को इतना झकझोरा कि उन्‍होंने जीवनपर्यंत धोती पहनने का प्रण ले लिया।

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कोलभील गांव में लोगों की गरीबी देखकर गांधी ने चरखा कातने और वस्‍त्र त्‍याग का लिया था निर्णय

नई दिल्‍ली। दक्षिण अफ्रीका में प्रवासी वकील के रूप में भारतीय समुदाय के लोगों के नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने के बाद 1915 में महात्‍मा गांधी भारत लौटे। यहां पर राष्‍ट्रीय कांग्रेस से सक्रिय रूप से जुड़ने से पहले उन्‍होंने देशभर में घूमकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ किसानों, मजदूरों और शहरी श्रमिकों को गरीबी, भूमि कर और भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए एकजुट किया। इस क्रम में चंपारण सत्‍याग्रह के दौरान महात्मा गांधी की बिहार के कोलभील गांव की एक ऐसी महिला से मुलाकात हुई जिसने उनकी सोच को ही बदलकर रख दिया। यही वो गांव है जहां पर गरीबी के नारकीय स्‍वरूप देखकर बापू ने जीवन भर धोती पहनने का निर्णय ले लिया। यहां पर उन्‍होंने एक और प्रण यह लिया कि वो धोती चरखा से काते गए धागे से बने कपड़ों का ही पहनेंगे। अपने इस प्रण का निर्वहन उन्‍होंने अंतिम सांस लेने तक किया।

लोककथाओं में आज भी होता है जिक्र

चंपारण सत्‍याग्रह से जुड़ीं ऐसी कई कहानियां चंपारण और उसके आसपास के क्षेत्रों में लोककथाओं के रूप में आज भी प्रचलित हैं। इसके जानकार लोग इसका जिक्र भी करते नजर आ जाते हैं। भले ही गांधी गरीबी के जिस रूप से चंपारण में रूबरू हुए वो इतिहास के पन्नों में शायद न मिले, लेकिन पीढिय़ों से चंपारण के लोग इसका जिक्र करते आए हैं। इस क्षेत्र के लोगों का तो यहां तक मानना है कि चंपारण की इस हृदय को छूने वाली सच्चाई को महसूस कर बापू महात्मा बन गए। एक ऐसी सच्चाई जिसमें गरीबी की वजह से महिलाओं के पास पूरा तन ढकने को भी कपड़े भी नहीं होते थे।

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बापू ने पूछा: कस्‍तूरबा, यहां की महिलाएं गंदे कपड़े क्‍यों पहनती हैं?

दरअसल, चंपारण सत्याग्रह के दौरान बापू पहली बार 27 अप्रैल, 1917 को चंपारण के भितिहरवा पहुंचे थे। वो नरकटियागंज के रास्ते यहां पहुंचने के बाद किसानों की पीड़ा जानने के लिए गांव-गांव घूमते रहे और उन्हें दस्तावेज की शक्ल देते। वे गांवों में जनसभाएं भी करते थे। भितिहरवा आश्रम के सेवक अनिरुद्ध चौरसिया और गांव के लोग बताते हैं कि बापू जब गांवों में किसानों की समस्या सुनते तो हमेशा महसूस करते कि पीड़ा बताने वालों में महिलाओं की संख्या बेहद कम होती है। ये पहेली बापू की समझ से परे थी।

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एक दिन दोपहर को वे भितिहरवा आश्रम के ढाई कोस पश्चिम में स्थित गांव कोलभील पहुंचे। यह गांव हड़बोड़ा नदी के किनारे बसा एक छोटा सा कस्बानुमा इलाका था। बाद में यह कस्बा नदी के कटाव में विलीन हो गया। कोलभील गांव में भ्रमण करने के दौरान बापू की नजर एक महिला पर पड़ी, जो काफी मैले-कुचैले कपड़े पहने हुए थी। ग्रामीणों का कहना है कि बापू ने उस महिला को देखने के बाद उस वक्त तो कुछ नहीं कहा, पर आश्रम लौटने पर कस्तूरबा को यह बात बताई। बापू ने कस्‍तूरबा से कहा कि उनकी जनसभाओं में भी जो महिलाएं आती हैं वे काफी गंदे कपड़े पहने होती हैं। जरा पता करो इसकी वजह क्या है।

जब कस्‍तूरबा को एक महिला ने कराया गरीबी से रूबरू

बापू के कहने पर कस्तूरबा अगले दिन कोलभील गांव गईं और वहां उन्होंने एक महिला से गंदे रहने की वजह पूछी। इस सवाल पर पहले तो वह महिला चुप रही। काफी कुरेदने पर जब महिला का दर्द जाग गया तो उसने कस्तूरबा का हाथ पकड़ा और उन्हें अपने घर के भीतर ले गई। महिला ने अपनी एक लोहे की संदूकची खोल कर कस्तूरबा के सामने कर दी और उनसे सवाल किया, आप बताएं मैं गंदी न रहूं तो क्या करूं? मेरे पास सिर्फ यही एक धोती है, जिसका आधा हिस्सा धोकर रखती हूं और शेष आधा हिस्सा पहने रहती हूं। मेरा काम ऐसे ही चलता है।

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कस्‍बूरबा की बात सुन बापू ने लिया ऐसा प्रण

गरीबी के इस दारुन रूप को करीब से देखकर कस्तूरबा दुखी हो गईं। दुखी मन से कोलभील से लौटने के बाद उन्होंने बापू के सामने सारा सच जैसा देखा उसी रूप में बयां कर रख दिया। यह सुनने के बाद बापू द्रवित हुए और उसी क्षण प्रण लिया कि वो अब पूरे कपड़े कभी धारण नहीं करेंगे। इसके बाद उन्होंने पूरे कपड़े त्याग कर खादी से बनी एक धोती से अपना शरीर ढक लिया। उसी दिन बापू ने यह प्रण भी लिया कि वे चरखा कातेंगे और अपने कपड़े खुद बुनेंगे तथा औरों को भी इसके लिए प्रेरित करेंगे। आपको बता दें कि भारत दर्शन के दौरान हुए इस कड़वे अनुभव ने ही बापू के मन में ग्राम स्‍वराज और समता के सिद्धांत को पैदा किया।