28 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Ajit Pawar Death: चाचा से बगावत, बहन से सियासी जंग! दो साल में ऐसे बिखरता चला गया पवार परिवार

महाराष्ट्र की राजनीति में 'दादा' के नाम से पहचाने जाने वाले अजित पवार का बारामती में एक विमान हादसे में निधन हो गया है। वह आज सुबह मुंबई से बारामती चुनावी सभा के लिए जा रहे थे। लेकिन बारामती में लैंडिंग के वक्त उनका छोटा विमान क्रैश हो गया।

2 min read
Google source verification

मुंबई

image

Dinesh Dubey

Jan 28, 2026

Ajit Pawar death

अजित पवार (Photo: X/NCP)

महाराष्ट्र की राजनीति के 'दादा' कहे जाने वाले अजित पवार अब हमारे बीच नहीं रहे। आज (28 जनवरी) सुबह पुणे के बारामती में लैंडिंग के दौरान उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। यह हादसा उस वक्त हुआ जब वे जिला परिषद चुनाव के प्रचार के लिए मुंबई से बारामती जा रहे थे। अधिकारियों ने बताया कि विमान में सवार महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार समेत सभी 5 लोगों की इस दर्दनाक हादसे में मौत हो गई है।

चाचा के खिलाफ फूंका बगावत का बिगुल

महाराष्ट्र की राजनीति में 'पवार' परिवार की एकता कभी उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती थी, लेकिन आज यह परिवार दो फाड़ हो चुका है। दशकों तक अपने चाचा शरद पवार के दाहिने हाथ रहे अजित पवार ने 2023 में एक बड़ी राजनीतिक बगावत की थी। उन्होंने न केवल एनसीपी (NCP) पर अपना दावा ठोका, बल्कि भाजपा-शिवसेना सरकार में शामिल होकर उपमुख्यमंत्री का पद संभाला। इस कदम ने शरद पवार और उनकी बहन सुप्रिया सुले के साथ उनके रिश्तों को पूरी तरह बदल दिया।

उत्तराधिकार की जंग में सुप्रिया सुले से बिगड़े रिश्तें

चाचा-भतीजे के रिश्तों में खटास की सबसे बड़ी वजह 'राजनीतिक उत्तराधिकार' मानी जाती है। सालों तक अजित पवार को शरद पवार का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाता रहा। राज्य की राजनीति और संगठन पर अजित की पकड़ मजबूत थी। हालांकि, जब सुप्रिया सुले ने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और दिल्ली पहुंचकर सांसद के तौर पर अपनी पहचान बनाई, तो समीकरण बदलने लगे।

पिछले साथ पवार परिवार के गढ़ बारामती में हुए लोकसभा चुनावों में अजित पवार ने सुप्रिया के सामने अपनी पत्नी सुनेत्रा पवार को उतारा था, जिससे भाई-बहन के बीच की यह खाई और गहरी हो गई।

'किंगमेकर' बनने की महत्वाकांक्षा

अजित पवार को हमेशा लगा कि संगठन पर उनकी मजबूत पकड़ के बावजूद शरद पवार ने सुप्रिया सुले को राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाया। अजित पवार को हमेशा से एक जमीनी स्तर पर काम करने वाले नेता के रूप में जाना जाता था। वह राज्य में सबसे ज्यादा बार उपमुख्यमंत्री रहे, लेकिन उनकी मुख्यमंत्री बनने की इच्छा कभी पूरी नहीं हो पाई। उन्हें लगा कि शरद पवार के नेतृत्व में वह हमेशा दूसरे नंबर पर ही रहेंगे। 2019 में देवेंद्र फडणवीस के साथ तड़के की गई शपथ और फिर 2023 में एक बार फिर बगावत कर भाजपा नीत एनडीए (NDA) में शामिल होना, उनकी इसी महत्वाकांक्षा का परिणाम समझा जाता है।

विचारधारा बनाम सत्ता का संघर्ष

शरद पवार हमेशा से धर्मनिरपेक्ष राजनीति और भाजपा के विरोध की धुरी रहे हैं। इसके विपरीत, अजित पवार का तर्क था कि विकास के लिए सत्ता में रहना जरूरी है। सुप्रिया सुले ने हमेशा अपने पिता के विचारों का समर्थन किया, जिससे भाई-बहन के बीच एक वैचारिक दूरी आ गई। सुप्रिया ने सार्वजनिक मंचों पर कई बार कहा कि पार्टी और परिवार अलग हैं, लेकिन अजित की बगावत ने इन दोनों को ही चोट पहुंचाई।

पार्टी के नाम और निशान की लड़ाई

रिश्तों में कड़वाहट तब चरम पर पहुंच गई जब लड़ाई चुनाव आयोग तक जा पहुंची। पार्टी का नाम (NCP) और चुनाव चिन्ह घड़ी अजित पवार के पास चले जाने को शरद पवार ने एक 'विश्वासघात' के रूप में देखा। सुप्रिया सुले के लिए यह केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं, बल्कि पिता के सम्मान की लड़ाई बन गई।

रिश्तों में आई दरार के बावजूद अजित पवार के निधन की खबर मिलते ही शरद पवार और सुप्रिया सुले दिल्ली से तुरंत बारामती के लिए रवाना हो गए हैं। राजनीति के गलियारों में चर्चा है कि सत्ता और विचारधारा की इस जंग में पवार परिवार ने आज अपना एक मजबूत स्तंभ खो दिया है।