
उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे
मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीतिक अनिश्चितता पर विराम लगाते हुए बीजेपी के समर्थन से शिवसेना के बागी एकनाथ शिंदे ने दो दिन पहले ही राज्य के 20वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। देवेंद्र फडणवीस को छोड़ शिंदे को महाराष्ट्र के अगले मुख्यमंत्री के तौर पर चुनने का बीजेपी का फैसला आम से लेकर खास तक के लिए चौंकाने वाला था, लेकिन सूबे के सियासी गणित व हिंदूत्व कार्ड के लिए यह बिलकुल सही था। इस कदम के पीछे की एक मुख्य वजह बीजेपी अपने साथ पूर्व सहयोगी (शिवसेना) के साथ परंपरागत तौर पर जुड़ी क्षेत्रीय भावना को अपने पाले में लाना चाहती है।
पॉलिटिकल पंडितों की मानें तो बीजेपी का शिंदे को सीएम पद सौंपना इसलिए काफी महत्वपूर्ण हो जाता है जब भगवा दल की निगाहें 2024 के लोकसभा चुनावों और उसी साल राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों की बड़ी लड़ाई पर टिकी हुई हैं। यह भी पढ़ें-Maharashtra Politics: शिंदे की सरकार बनते ही संजय राउत के बदले तेवर, कहा- मेरे खिलाफ जांच राजनीतिक दबाव में नहीं हो रही
हिंदुत्व की एक अधिक निर्भीक छवि को प्रदर्शित करने वाली शिवसेना की दो दशक से ज्यादा समय तक जूनियर रही बीजेपी को उम्मीद है कि इस नई भूमिका में वह (शिंदे) क्षेत्रीय भावनाओं के साथ उसे जोड़कर मजबूत कर पाएंगे जिसे अब तक शिवसेना भुनाती रही है।
शिंदे गुट के साथ बीजेपी के आने और खुद जमीनी स्तर से उभरे मराठा राजनेता शिंदे को सरकार में शीर्ष पर पहुँचाने से अधिक संख्या में शिवसैनिक व नेता बागी खेमे के समर्थन में आएंगे। इसके साथ ही शिंदे एनसीपी और शिवसेना जैसे दलों के प्रति झुकाव रखने वाली राज्य की सबसे प्रभावशाली जाति मराठा से आते हैं। ऐसे में बीजेपी के पक्ष में इस समुदाय के भी शिंदे के माध्यम से जुड़ने की उम्मीद है।
एक विचार यह भी है कि आने वाले समय में शिवसेना के दोनों धड़ों में सियासी जंग और तेज होने की उम्मीद है। बीजेपी खुद पर कोई आंच नहीं आने देना चाहती क्योंकि शिंदे को शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे पार्टी से निकाल चुके है और यह मामला अब भी तकनीकी रूप से अदालत में है। यह आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि शिवसेना के दो गुटों के बीच की लड़ाई राजनीतिक रूप से कैसे चलेगी, क्योंकि ठाकरे ब्रांड को कम आंकना बड़ी गलती हो सकती है।
असली शिवसेना कौन है और बाल ठाकरे की विरासत का असली उत्तराधिकारी कौन है, यह साबित करने के लिए शिंदे और ठाकरे के बीच लड़ाई लंबी चलने की पूरी उम्मीद है। यह लड़ाई चुनाव आयोग, कोर्ट और अंतत: मतदाताओं तक जाएगी। बीजेपी उम्मीद कर रही है कि यह संघर्ष जितना दिन भी चलेगा, दोनों कमजोर होंगे और अंततः शिवसेना कमजोर होकर खत्म होगी। हालांकि इस बीच बीजेपी की राह में भी चुनौतियां कम नहीं होंगी।
Published on:
02 Jul 2022 04:40 pm
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