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पत्नी को रसोई में जाने से रोकना क्रूरता! बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा- पति पर FIR होनी चाहिए

Marital Dispute News: हाई कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए पति के खिलाफ दर्ज उत्पीड़न के मामले को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया।

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मुंबई

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Dinesh Dubey

Apr 09, 2026

Maharashtra Couple crime

पत्नी को किचन में जाने से रोकना क्रूरता- बॉम्बे हाईकोर्ट (AI Image)

बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) की नागपुर खंडपीठ ने वैवाहिक अधिकारों और महिलाओं की गरिमा को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि पत्नी को रसोई (किचन) में जाने से रोकना और उसे बाहर से खाना लाने के लिए मजबूर करना मानसिक उत्पीड़न (Mental Cruelty) है।

यह फैसला न्यायमूर्ति जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के की एकल पीठ ने सुनाया। अदालत ने पति के खिलाफ दर्ज उत्पीड़न के मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया और स्पष्ट किया कि इस तरह का व्यवहार सिर्फ घरेलू विवाद नहीं बल्कि महिला के सम्मान पर सीधा हमला है।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला अकोला की रहने वाली एक महिला से जुड़ा है, जिसका विवाह नवंबर 2022 में नागपुर के एक व्यक्ति से हुआ था। शुरुआत में सब कुछ सामान्य था, लेकिन कुछ समय बाद दोनों के बीच विवाद शुरू हो गया।

महिला ने आरोप लगाया कि उसे घर में दोयम दर्जे का व्यवहार दिया गया और उसके बुनियादी अधिकार भी छीन लिए गए। सबसे गंभीर आरोप यह था कि उसे किचन में जाने से रोका गया और घर में खाना बनाने का अधिकार तक नहीं दिया गया। उसे बाहर से खाना मंगाने के लिए मजबूर किया जाता था।

इसके अलावा महिला ने यह भी आरोप लगाया कि उसके गहने घर से बाहर फेंक दिए गए, मायके जाने से रोका गया और तलाक के लिए दबाव बनाया गया।

कोर्ट ने क्या कहा?

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि पत्नी को किचन में जाने से रोकना उसके व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सम्मान का उल्लंघन है। यह व्यवहार मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि रोजमर्रा की जिंदगी की बुनियादी चीजों से किसी को वंचित रखना, उसकी गतिविधियों पर नियंत्रण रखना और लगातार मानसिक दबाव बनाना, उत्पीड़न के स्पष्ट उदाहरण हैं।

पति की दलील खारिज, लेकिन सास को राहत

पति की ओर से यह दलील दी गई थी कि महिला ने तलाक याचिका के बाद बदले की भावना से शिकायत दर्ज कराई है। हालांकि, अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इस तर्क को खारिज कर दिया।

हालांकि, अदालत ने पति के खिलाफ मामला जारी रखा, लेकिन महिला द्वारा आरोपी बनाई गई सास को बड़ी राहत द। अदालत ने कहा कि सास के खिलाफ लगाए गए आरोप सामान्य और अस्पष्ट थे। केवल पति की मां होने के नाते उन्हें अपराधी नहीं माना जा सकता। अदालत ने सास के खिलाफ दर्ज मामला रद्द करने का निर्देश दिया।

इस फैसले को महिलाओं के अधिकारों और वैवाहिक जीवन में सम्मान की दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि घर के अंदर भी किसी महिला के साथ भेदभाव या अपमानजनक व्यवहार को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।