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‘कौन देस को वासी-वेणु की डायरी’ के लोकापर्ण पर बोली डॉ. सूर्यबाला- जीवन में जो महसूस किया, वही लिखा

सूर्यबाला ने आगे कहा कि मैं पाठकों को अपना इष्‍ट मानती हूँ ,यदि पाठक न हों तो मैं आज यहां न होती। आज की शाम पाठकों के आभार की शाम मानती हूँ

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(मुंबई): ‘प्रेम, विश्‍वास, संबंधों को लेकर जीवन में जो महसूस किया, वही लिखा।’ ये विचार सुप्रसिद्ध कथाकार डॉ. सूर्य बाला ने अपनी 75 वीं वर्षगांठ पर ‘आभार की एक शाम’ कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित उनके नए उपन्‍यास ‘कौन देस को वासी...वेणु की डायरी’ के लोकार्पण के अवसर पर कहे।

सूर्यबाला ने आगे कहा कि मैं पाठकों को अपना इष्‍ट मानती हूँ ,यदि पाठक न हों तो मैं आज यहां न होती। आज की शाम पाठकों के आभार की शाम मानती हूँ। समृद्धि तो आती-जाती है पर असली समृद्धि तो तब आती है जब हमें सबका प्‍यार, स्‍नेह मिलता है। मुझे मेरे माता-पिता ने शहजादियों की तरह, बिना अभावों के पाला पोसा इसलिए मेरे कथानकों में स्‍त्रीपात्र आदमकद हैं। कई पाठक मुझे पूछते हैं कि आपके स्‍त्री पात्र आक्रामक और तिलमिलाते क्‍यों नहीं? न बोलने वाली स्‍त्रीपात्रों ने भी कभी गलत को नहीं चुना। खुद्दारी और आत्‍मसम्‍मान पर चुप्‍पी भी बहुत बड़ी ताकत है। मुझसे सवाल किया जाता है कि क्‍या लिखने से समाज बदलता है? हमने समाज को बदला है क्‍योंकि हमने स्‍त्री मुक्ति का पाठ घूंघट में पढ़ा है। परिवार ने विश्‍वास के साथ घर के साथ-साथ एमए, पीएचडी करने की स्‍वीकृति दी।

समीक्षक मनमोहन सरल ने कहा कि इस उपन्‍यास को लिखने में 12 वर्ष लगे और बेहद पठनीय, मनोरंजक है। उस समय के अमेरिका के सामाजिक, सांस्‍कृतिक हालात की जानकारी मिलती है। वरिष्‍ठ साहित्‍यकार डॉ. रामजी तिवारी ने उपन्‍यास के कई दृष्‍टांत देते हुए कहा कि यह सूर्यबाला की 22 वीं कृति है। ये उनके लेखन का सुफल 75 वां जन्‍म दिन मतलब ये उनका अमृत महोत्‍सव है, यह उन्‍होंने नहीं लिखा बल्कि पाठकों के आग्रह पर परिस्थितियॉं बनती गई और वे लिखती गईं। उनके इस उपन्‍यास में दो संस्‍कृतियों की टकराहट है– यांत्रिक जीवन और सामाजिक जीवन और भौतिक साधनों का विरोधाभास है। जब दो धाराएं मिलती हैं तो यह उत्‍सव हो जाता है –जन्‍म दिन और पुस्‍तक का लोकार्पण। उनके लेखन में अमरत्‍व का समावेश होकर वे आगे बढ़ती जाएं, यही कामना है।


भोपाल से आई वरिष्‍ठ कथाकार मालती जोशी ने कहा कि आज मंगल कार्यक्रम है क्‍योंकि महिला व्‍यंग्‍यकार का पहला श्रेय उन्‍हें है। उपन्‍यास लिखना जीवटता का काम है। उनके लिए शाश्‍वत- सार्थक लेखन प्राथमिकता है और वही लेखन कालजयी हेाता है। उन्‍होंने चुटकी लेते हुए कहा कि मुझमें और सूर्यबाला में कई समानताएं हैं। हमारे लिए लेखन की कोई डेड नहीं होती, वे भी नई तकनीक नहीं जानती, मैं भी नहीं जानती, वे भी बिना किसी जलसी के लिखती हैं और मैं भी। दोनों में ईगो प्राब्‍लम नहीं है। सबसे महत्‍वपूर्ण बात ये है कि मैं उनको जितने प्‍यार से पढ़ती हूँ ,उतने ही प्‍यार से मेरी बहू भी पढ़ती है। उनके लिए शाश्‍वत, सार्थक लेखन प्राथमिता है, यही उनकी रचनाओं को कालजयी बनाता है।


व्‍यंग्‍य लेखन टेढ़ा काम है। कब, किसको ,कौनसी टिप्‍पणी खल जाए, कहना बहुत मुश्किल है। स्‍वयं पर व्‍यंग्‍य करना सरल है पर अपने पर हंसना कठिन है। उन्‍होंने शुभेच्‍छा व्‍यक्‍त की कि वे सुखी, संपन्‍न और सानंद रहे।


कहानीकार सुधा अरोड़ा ने कहा कि डॉ. सूर्यबाला का व्‍यंग्‍य और उसकी विट इस उपन्‍यास में चरम परिणति में है जिसका फलक बहुत विशाल है। कथानक में बहुत संतुलन है जो बहुत खूबसूरतीसे पतली डोर पर रहकर सूर्यबाला जी ने साधा है। उन्‍होंने आगे कहा कि हम दोनों एक दूसरे की 40 वर्षों से आलोचक होने के बावजूद मित्रता पक्‍की है। यह उपन्‍यास बहुत बड़े फलक का है।


लेखक डॉ. दामोदर खड़से ने कहा कि बहुत सूक्ष्‍मता और संवेदनशीलता के साथ वेणु के पात्रको गढ़ा है। स्‍वयं के साथ संवाद करने वाला उपन्‍यास है। अचरज का विषय यह है कि इस उपन्‍यास पर उनके परिवार की छाया है या परिवार उपन्‍यास पर छाया है , समझना मुश्किल है। सूर्यबाला के लेखन में महिला, स्‍त्री विमर्श पर केन्द्रित महिला पात्रों के संबंध में वंदना शर्मा ने विस्‍तार से जानकारी दी।


‘ नवनीत’ के संपादक विश्‍वनाथ सचदेव ने कहा कि उपन्‍यास भीतर तक छूता है, जीवन को समझने की एक ईमानदार कोशिश है और पाठकों से घनिष्‍ठ रिश्‍ता बनाता है। आज सभागार में जितने बैठे हैं ,वे ही डॉ. सूर्यबाला के आत्‍मीय पाठक-परिवार नहीं हैं बल्कि दुनिया में लाखों पाठक हैं जो उनके लेखन का बेसब्री से इंतजार करते हैं। इसलिए पाठक का भी दायित्‍व बनता है कि वे अपने लेखक का आभार माने। पुरस्‍कारों से लेखक सम्‍मानित नहीं होता है बल्कि आभार मानने से बड़ा होता है।

अभिनेत्री नेहा शरद, अभिनेता राजेन्‍द्र गुप्‍ता, अलका अग्रवाल,अभिलाष, दिव्‍या, अनुराग, नेहा,आलोक, निधि लाल आदि ने उपन्‍यास के चुनिंदा अंशों का सशक्‍त पाठ किया। डॉ. सूर्यबाला ने यह पुस्‍तक अपने एक पाठक गंगाशरण सिंह को समर्पित करने की घोषणा की जिन्‍होंने पिछले पचास वर्षों के दौरान फेसबुक के माध्‍यम से हिंदी के सभी साहित्‍यकारों को आम पाठकों तक पहुंचाने का भगीरथ प्रयास करने वाले गंगाशरण सिंह का सम्‍मान किया।