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महाराष्ट्र के इस गांव में सदियों से नहीं बेचा जाता है ‘दूध’, जानें इसके पीछे की असल वजह

महाराष्ट्र के कई ऐसे गांव है जिनकी कुछ न कुछ कहानियां है। ऐसे ही एक एक गांव है, येलेगांव गवली, इस गांव की अनोखी परंपरा है कि यहां के लोग दूध बेचते नहीं, मुफ्त में बांट देते हैं। आज भी ये लोग अपनी परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं।

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हमारा देश अजब-गज़ब है। यहां कई कहानियां बसती हैं। महाराष्ट्र के हिंगोली जिले का एक गाँव है- येलेगांव गवली जहां के ग्रामीण दूध नहीं बेचते हैं, बल्कि जरूरतमंद लोगों को मुफ्त में बांट देते हैं। ऐसा एक परंपरा के चलते किया जाता है। इस गांव में रहने वाले ज्यादातर लोग मवेशी हैं। यहां दूध बेचने का नियम नहीं है। यहां के रहने वाले लोग खुद को भगवान श्री कृष्णा का वंशज मानते हैं और दूध को न बेचने की परंपरा को निभाते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस गांव के रहने वाले 60 वर्षीय राजाभाऊ मंडडे ने बताया कि ये दूधियों का गांव है। भगवान कृष्णा का वंशज होने के नाते हम दूध न बेचने की अपनी परंपरा को निभाते हैं। उन्होंने बताया कि हमारे गांव के 90 प्रतिशत घरों में मवेशी हैं, लेकिन कोई भी निवासी दूध नहीं बेचता है और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का पालन किया जा रहा है। यह भी पढ़ें: Mumbai News: महिला ने शादीशुदा मर्द से बनाए अवैध संबंध, बेटी के स्कूल वेबसाइट पर अपलोड कर दीं अंतरंग तस्वीरें; कोर्ट पहुंचा केस

राजाभाऊ मंडडे ने आगे कहा कि अगर दूध ज्यादा है, तो उसे बेचने की जगह मिल्क प्रोडक्ट्स बना लिया जाता है। मगर इसे बेचा नहीं जाता। अगर किसी को भी दूध की जरूरत है तो उसे फ्री में दे दिया जाता है। इस गांव में एक कृष्ण भगवान का मंदिर है, जन्माष्टमी का त्यौहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। हालांकि, कोरोना महामारी की वजह से पूजा-पाठ नहीं किया जा रहा, सादे तरीके जन्माष्टमी मनायी जा रही है।

येलेगांव के 44 साल के सरपंच शेख कौसर ने कहा कि इस गांव में से कोई भी, चाहे हिंदू, मुस्लिम या किसी अन्य धर्म से संबंधित हों अपने मवेशियों के दूध को नहीं बेचते हैं। यहां 550 घरों में से करीब 90 प्रतिशत गाय, भैंस और कुछ बकरियां हैं। लेकिन हम दूध मुफ्त बांटते हैं। बता दें कि इस गांव की इस अनोखी परंपरा को निभाने वाले रहवासी इस काम को करते हुए बड़े प्रसन्न होते हैं।