
कर्म बंधनों का क्षय ही परमात्मा प्राप्ति है: शिव मुनि
पुणे. जैन धर्म किसी एक ईश्वर या किसी एक ऐसी शक्ति को स्वीकार नहीं करता जो सारी सृष्टि का परिचालन करती हो। जैन धर्म मानता है कि प्रत्येक प्राणी की एक स्वतंत्र आत्मा है और वही आत्मा जब धीरे -धीरे अपने समस्त कर्म बंधनों का क्षय कर देती है ,तब वह सदा -सदा के लिए मुक्त होकर परमात्मा स्वरुप सिद्ध बन जाती है। आत्मा का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है इसे जानना ही चाहिए।
आत्मा सदा अपने स्वरूप में स्थिर, अचल है
यह विचार श्री वर्धमान स्थानकवासी श्रमण संघ के आचार्य डॉक्टर शिवमुनि ने यहां पुणे महानगर में चल रहे अपने चातुर्मास के दौरान दैनिक प्रवचन के समय व्यक्त किए। जीवन के अर्थ को जानने ,उसके लक्ष्य को पहचानने तथा इस दुर्लभ मानव जीवन को सार्थक करके सदा -सदा के लिए भव- बंधन से मुक्ति प्राप्त करने के लिए आत्मा को जानने के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है। मनुष्य शुद्ध, बुद्ध ,नित्य, चेतन, आनंदमय आत्मा है। उस आत्मा का देह के नास- निर्माण के साथ नाश -निर्माण नहीं होता। नाम का महत्व और हीनत्व उसे महान और हीन हीं बना सकता ।वह सदा निर्विकार है। न आत्मा को कोई गाली दे सकता है, ना मार सकता है ,ना पीड़ित कर सकता है। इसलिए कृष्ण ने गीता में कहा आत्मा सदा अपने स्वरूप में स्थिर, अचल है। इसी अपने शुद्ध और यथार्थ स्वरूप को जान लेना ही जीवन को जान लेना है।
यही जीवन की सार्थकता है
मुनि ने कहा आत्मा हमारा बल है वह अनंत शक्ति शालिनी है। आत्मा में ही परमात्मा बल है ,जिसके पास आत्मबल नहीं है उसे परमात्मा बलबी प्राप्त नहीं हो सकता राम और रावण की विजय पराजय का रहस्य क्या है रावण अत्यंत शक्तिशाली था उसके बल का कहीं कोई अंत न था तब वह राम से पराजित कैसे हुआ क्योंकि राम के पास आत्मबल था आत्म बल संसार के सारे भौतिक बल से बढ़कर है उसकी तुलना में भौतिक बल कुछ है ही नहीं इसलिए यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि आत्मा में अनंत शक्ति है केवल मुंह की गहरी चादर से ढक गई है। इसी कारण मनुष्य में वासना, कामना, ओर विषयासक्ति ने अपना डेरा डाल रखा है। इसी से मनुष्य पाप ताप से पीड़ित रहता है।
हिंसा दुख री बेनड़ी
युवाचार्य महेंद्र ऋषि महाराज ने कहा कि वर्तमान में हम हिंसा के वातावरण में जी रहे हैं ।ऐसे वातावरण से मुक्ति पाना अहिंसा के मार्ग से ही सम्भव है, साथ ही संत समागम सार्थक मार्ग है। उन्होंने कहा हिंसावृत्ति को अपने हृदय में धारण करने वाला मनुष्य राक्षस बन जाता है। वह कभी किसी प्राणी का हित नहीं कर सकता ।स्वार्थ वृत्ति से प्रेरित होकर वह अच्छे से अच्छे आदमी की भी हत्या कर देता है ,और इस प्रकार मानवता की गंभीर हानी करता है ।इसके अलावा वेर से कभी वेर शांत होता ही नहीं ,अग्नि में घी डालने से कभी अग्नि शांत नहीं, बल्कि अधिक तीव्र हो जाती है। अग्नि की शांति तो शीतल जल से ही होती है। इसी प्रकार हिंसा रूपी भयानक अग्नि का शमन करने के लिए अहिंसा रूपी शीतल जल का ही प्रयोग उचित तथा विवेक सम्मत है।
तपस्या की लगी है झड़ी
चातुर्मास समिति के महामंत्री विजय भंडारी के अनुसार यहां आचार्य शिवमुनि के चातुर्मास प्रारंभ होने के साथ ही विभिन्न प्रकार के शिविरों का आयोजन हो रहा है। जिनमें प्रमुख रूप से ध्यान के साथ ,-साथ यम, नियम, आसन, प्राणायाम आदि भी नियमित रूप से कराए जा रहे हैं ।अब तक तपस्याओं की झड़ी लग चुकी है। एकाआसन, बेला, तेला, पांच के अलावा सात सौ पचास से अधिक अठाई की तपस्या हो चुकी है। इसी प्रकार मास खमण की तपस्याए भी अनवरत रूप से चल रही है।खींवसरा के अनुसार प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में देशभर के विभिन्न प्रांतों से अनगिनत श्रीसंघ यहां आचार्यश्री, युवाचार्य ,प्रवर्तक ,उपप्रवर्तक एवं अन्य मुनि वृंदो के दर्शनों के लिए पहुंच रहे हैं।
Published on:
12 Sept 2019 11:42 pm
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