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राज ठाकरे के साथ आते ही सताने लगा वोट खोने का डर! उद्धव सेना और कांग्रेस बोली- हम हिंदी के खिलाफ नहीं

Maharashtra Politics : संजय राउत ने कहा, दक्षिण भारत के राज्य हिंदी के विरोध में हैं, लेकिन महाराष्ट्र की स्थिति अलग है। यहां हिंदी बोली जाती है, हमारे पास हिंदी फिल्में, नाटक और संगीत हैं। हम किसी को हिंदी बोलने से नहीं रोकते।

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मुंबई

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Dinesh Dubey

Jul 06, 2025

Raj Thackeray and Uddhav Thackeray unite

उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे (Photo: IANS)

महाराष्ट्र में आगामी स्थानीय और नगर निकाय चुनावों से पहले मराठी अस्मिता और भाषा के नाम पर राजनीति गरमाई हुई है। राज्य में मराठी बनाम हिंदी विवाद ने शनिवार को उस समय नया मोड़ ले लिया जब शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख और उनके चचेरे भाई एवं मनसे प्रमुख राज ठाकरे दो दशक बाद एक मंच पर नजर आए और पुराने मनमुटाव भुलाने की घोषणा की। हालांकि ठाकरे भाईयों के एक होने से मुंबई, ठाणे, पुणे, नागपुर आदि जिलों में रह रहें हिंदी भाषी वोटों के विपक्ष से छिटकने की प्रबल संभावना बन गई।

मैं हिंदी में बोलता हूं, सोचता हूं- राउत

शिवसेना (UBT) और कांग्रेस ने आगामी चुनाव में संभावित नुकसान को भांपते हुए साफ कर दिया है कि वे हिंदी भाषा के खिलाफ नहीं, बल्कि प्राथमिक शिक्षा में जबरन हिंदी थोपे जाने के खिलाफ हैं। शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत ने कहा, “दक्षिण भारतीय राज्य इस मुद्दे पर वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं। वहां हिंदी थोपे जाने का विरोध इस हद तक है कि वे न खुद हिंदी बोलते हैं, न किसी और को बोलने देते हैं। लेकिन महाराष्ट्र में हमारा ऐसा कोई रुख नहीं है। हम हिंदी बोलते हैं, पढ़ते हैं, देखते हैं और हिंदी में सोचते भी है… हमारा रुख सिर्फ इतना है कि प्राथमिक स्कूलों में हिंदी को जबरन थोपने की सख्ती बर्दाश्त नहीं की जाएगी। हमारी लड़ाई सिर्फ इसी तक सीमित है… हमने कभी किसी को हिंदी बोलने से नहीं रोका, क्योंकि हमारे यहां हिंदी फिल्में हैं, हिंदी रंगमंच है, और हिंदी संगीत भी है… हमारी लड़ाई सिर्फ प्राथमिक शिक्षा में हिंदी थोपे जाने के खिलाफ है…”

कांग्रेस की तरफ से भी आई सफाई

वहीँ, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विजय वडेट्टीवार ने भी स्पष्ट किया, “हमने कभी हिंदी का विरोध नहीं किया है। हम सिर्फ स्कूलों में भाषा थोपे जाने के खिलाफ हैं। बीजेपी को इस बात की चिंता क्यों हो रही है कि कांग्रेस ठाकरे भाईयों के कार्यक्रम में नहीं गई, उन्हें पहले खुद की चिंता करनी चाहिए।”

दोनों दलों की ओर से यह बयान ऐसे समय में दिया गया है जब मनसे और शिवसेना (UBT) के एक मंच पर आने से हिंदी भाषी वोटरों में नाराजगी की आशंका जताई जा रही है। खासतौर पर इससे सबसे ज्यादा नुकसान उद्धव की शिवसेना और कांग्रेस को होने का अनुमान है।

गौरतलब हो कि महाराष्ट्र में इस वर्ष के अंत में होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग चाहता है कि पार्टी राज्य के उन ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में अकेले चुनाव लड़कर अपनी खोई हुई जमीन वापस हासिल करे, जहां बीजेपी की स्थिति मजबूत हो रही है।

कभी बीजेपी की सहयोगी रही उद्धव सेना वर्तमान में शरद पवार की एनसीपी (एसपी) और कांग्रेस के साथ विपक्षी महाविकास अघाडी (एमवीए) का घटक दल है. शिवसेना (उद्धव गुट) की मनसे के साथ नजदीकियों ने न केवल सत्तापक्ष बल्कि सहयोगियों में भी बेचैनी पैदा कर दी है।

महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों, 248 नगर परिषदों, 32 जिला परिषदों और 336 पंचायत समितियों के चुनाव इस वर्ष के अंत में या अगले वर्ष की शुरुआत में होने वाले हैं। ये चुनाव 2029 में होने वाले अगले विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में सबसे बड़ी चुनावी कवायद है।