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मनसे के दिवाली उत्सव में नए सियासी समीकरण के संकेत

राजनीतिक दलों में छठ पूजा की होड़, बिहार और पूर्वी यूपी के 20 लाख मतदाताओं पर निगाहेंबीएमसी सहित कई महानगर पालिकाओं के चुनाव करीब

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'राजसमन्द दुग्ध सहकारी संघ की चुनाव प्रक्रिया फर्जी'

'राजसमन्द दुग्ध सहकारी संघ की चुनाव प्रक्रिया फर्जी'

मुंबई. महाराष्ट्र में महानगर पालिका चुनाव (मनपा) को लेकर राजनीति तेज हो गई है। महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (मनसे) के दिवाली उत्सव में शामिल होकर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उप-मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने नए सियासी समीकरण के संकेत दिए हैं। सूत्रों के मुताबिक मुंबई, ठाणे, मीरा-भायंदर, वसई-विरार, नवी मुंबई आदि शहरों में होने वाले मनपा चुनाव के लिए भाजपा और बालासोहेबची शिवसेना राज ठाकरे की मनसे से हाथ मिला सकती है। वहीं, मनपा चुनाव के मद्देनजर छठ पर्व के आयोजन को लेकर राजनीतिक दलों में होड़ है। सियासी दल छठ पर्व के जरिए बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रवासियों का समर्थन पाना चाहते हैं। इनकी निगाहें मुंबई और इससे सटे शहरों में रहने वाले यूपी के पूर्वांचल और बिहार के करीब 25 लाख मतदाताओं पर हैं। मायानगरी में जुहू चौपाटी, मढ आइलैंड, गोराई, भायदंर की चौपाटियों, पवई लेक, ठाणे के तालाबों किनारे छठ व्रतियों के लिए बड़े आयोजन होते हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए भीड़ आकर्षित की जाती है। मशहूर लोक गायक भक्ति गीतों से लोगों का मनोरंजन करते हैं।
मुंबई में भाजपा, शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे और कांग्रेस छठ पूजा में शामिल होती हैं। बड़े पैमाने पर इसे मनाने का श्रेय कांग्रेस नेता संजय निरुपम को जाता है। शिवसेना में रहने के दौरान निरुपम जूहू चौपाटी पर कई बार सफल आयोजन कर चुके हैं। महाराष्ट्र के सांस्कृतिक मंत्री सुधीर मुनगंटीवार छठ पूजा मंडलों के साथ दो बार बैठकें कर चुके हैं। शीघ्र मंजूरी और जरूरी इंतजाम का आदेश भी प्रशासन को दे चुके हैं। इस साल जुहू चौपाटी पर पांच पंडाल लगाए जाएंगे। इनमें से तीन भाजपा जबकि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के एक-एक पंडाल होंगे। चुनावी तिकड़म के बीच भाजपा-एनसीपी कार्यकर्ता घाटकोपर में आमने-सामने हैं। दोनों ही दल एक ही मैदान में छठ पूजा पंडाल लगाना चाहते हैं। बीएमसी ने किसी को मंजूरी नहीं मिली है। दोनों ही पक्षों ने हाईकोर्ट में अर्जी लगाई है। यह लड़ाई बेवजह नहीं है। बीएमसी की 227 सीटों में से 50 पर हिंदी भाषियों का वर्चस्व है। आसपास के शहरों को भी शामिल कर लें तो लगभगग 100 पर जीत-हार का फैसला हिंदी भाषी करते हैं।