
राम मंदिर चंदा विवाद के बीच फिर हिंदुत्व की राजनीति को धार देने की कोशिश में जुटे उद्धव ठाकरे, फोटो सोर्स- IANS
Uddhav Thackeray: महाराष्ट्र की राजनीति में हाशिये पर चल रहे उद्धव ठाकरे के लिए क्या ‘राम मंदिर चंदा चोरी’ का मुद्दा संजीवनी साबित हो सकता है? इस सवाल का जवाब भविष्य ही बताएगा, लेकिन उद्धव ने कोशिश जरूर शुरू कर दी है। दादर के हनुमान मंदिर के बाहर खड़े होकर, राम रक्षा आंदोलन की शुरुआत, राम जन्मभूमि आंदोलन में बाला साहेब की भूमिका का जिक्र और बिना नाम लिए भाजपा पर कटाक्ष – उद्धव इस पूरे मामले को राजनीति बयानबाजी के बजाए आइडियोलॉजी पर ले आए हैं।
महा आरती, रामरक्षा स्तोत्र और हनुमान चालीसा जाप के साथ उद्धव ठाकरे ने यह दर्शाने का प्रयास किया कि जिस हिन्दुत्व की राह पर उनके पिता बाल ठाकरे चले थे, शिवसेना UBT आज भी उसी राह पर है। बस उसे भाजपा और उसके सहयोगी दलों जैसा दिखावा नहीं आता। उद्धव के भाषण का अधिकांश हिस्सा हाल के राजनीतिक घटनाक्रम के बजाए अयोध्या और राम जन्मभूमि आंदोलन पर केंद्रित रहा।
उन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन को याद करते हुए कहा कि शिवसैनिकों ने शिला पूजन, रथ यात्रा और कारसेवा में हिस्सा लिया था। सैंकड़ों लोगों ने अपना खून बहाया और कुर्बानी दी। BJP का नाम लिए बिना, उन्होंने सवाल किया कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद आखिर क्या बदला है? बारह साल पहले, हमने यह माना था कि अब हिंदू मार नहीं खाएगा। लेकिन इसके बजाए उसे लूटा जा रहा है। उद्धव ने यह भी साफ किया कि वह केवल चंदा संभालने वाले लोगों से सवाल कर रहे हैं, भगवान राम से नहीं।
भाजपा हिंदू और हिन्दुत्व के मुद्दे पर चुनाव लड़ती आई है। राम मंदिर को पार्टी अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि करार देती है। राम मंदिर ट्रस्ट के निर्माण में उसी की भूमिका थी। ऐसे में चंदा चोरी के आरोप पर जवाब तो उसे देना होगा, उद्धव ठाकरे यही कहना चाहते हैं। हालांकि, वह सीधे तौर पर किसी पार्टी का नाम नहीं ले रहे, क्योंकि उस सूरत में यह मुद्दा राजनीतिक बन जाएगा और राजनीतिक मुद्दे ज्यादा दूर तक नहीं चल पाते। उद्धव ठाकरे कहते हैं – हिंदू मासूम है, बेवकूफ नहीं, वो सब जानता है। ये एक मनोवैज्ञानिक दांव है – लोगों को यह समझाना कि आपको बेवकूफ बनाने के प्रयास होंगे, लेकिन आपको बनना नहीं है।
शिवसेना (UBT) नेताओं का कहना है कि यह हमारी पॉलिटिक्स बदलने की कोशिश नहीं है। बालासाहेब ने कभी हिंदुत्व को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया। यह पार्टी की आइडियोलॉजी थी, है और हमेशा रहेगी। हम बस लोगों को राम जन्मभूमि आंदोलन में शिवसेना की भूमिका की याद दिला रहे हैं। इससे पार्टी को भी हाल के राजनीतिक घटनाक्रम से ध्यान हटाकर विचारधारा पर आगे बढ़ने में मदद मिलेगी। बता दें कि शिवसेना के लिए, राम जन्मभूमि आंदोलन एक टर्निंग पॉइंट था। हिंदुत्व को मुख्यधारा की राजनीति में लाने के लिए बाल ठाकरे ने ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ नारे पर प्रमुखता से जोर दिया। उनकी लोकप्रियता महाराष्ट्र से बाहर तक फैली और उन्हें हिंदू हृदयसम्राट कहा जाने लगा। उस समय हिन्दुत्व का एक ही मतलब था - बाला साहेब।
महाराष्ट्र की राजनीति में या कहें कि हिन्दुत्व के इतिहास में ठाकरे का एक किस्सा आज भी खास जगह रखता है। यह दर्शाता है कि बाला साहेब अपने विचार, अपने फैसलों पर हमेशा अडिग रहे। जो सही लगा किया और जो किया उससे कभी इनकार नहीं किया। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद, जब पूरे देश में हंगामा हुआ तो तमाम बीजेपी नेताओं ने इससे दूरी बना ली। उस समय बाला साहेब ठाकरे ने कहा था - अगर शिव सैनिकों ने ढांचा गिराया है, तो उन्हें अपने सैनिकों पर गर्व है। उनका यह बयान शिवसेना कार्यकर्ताओं के लिए इस बात का प्रतीक बन गया कि वह एक ऐसे आंदोलन को सबके सामने अपनाना चाहते थे, जिस पर दूसरे दावा करने में हिचकिचा रहे थे। निश्चित ही बाबरी विध्वंस भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए एक दाग की तरह है, लेकिन इसने शिवसेना की पॉलिटिक्स को धार देने का काम किया था। हालांकि, ठाकरे के जाने के बाद यह धार कुंद पड़ती चली गई।
पहले उद्धव और राज ठाकरे अलग हुए। फिर एकनाथ शिंदे ने शिवसेना को दो-फाड़ कर दिया। बाला साहेब की पार्टी का आधिकारिक नाम और चुनाव चिन्ह लेकर वह भाजपा के साथ चले गए। उद्धव ठाकरे के लिए यह सबसे बड़ा झटका था और अब ऐसे झटकों की उन्हें आदत होती जा रही है। हालांकि, पार्टी नेताओं का कहना है कि बाल ठाकरे की पॉलिटिकल और आइडियोलॉजिकल विरासत उद्धव के पास ही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या जनता को भी यही लगता है? > Abhishek: उद्धव ठाकरे पर आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने अपने पिता के कट्टर हिन्दुत्व से किनारा कर लिया है। एकनाथ शिंदे और बीजेपी इस मुद्दे पर उन्हें घेरते रहे हैं। इसकी वजह है कांग्रेस और उसकी जैसे विचारधारा वाली पार्टियों से शिवसेना UBT का रिश्ता। उद्धव के सामने फिलहाल दोहरी चुनौती है -पारंपरिक हिंदुत्व वोटरों को यह यकीन दिलाना कि बाल ठाकरे की विचारधारा उन्हीं के पास है। साथ ही यह सुनिश्चित करना कि हिंदुत्व की राह पर उनके कदम सहयोगियों को असहज न करें।
Updated on:
06 Jul 2026 07:15 pm
Published on:
06 Jul 2026 07:15 pm
