
सहारनपुर में लगे अखिलेश यादव के पोस्टर (IANS Photo)
Muzaffarnagar Riots 13th Anniversary:मुजफ्फरनगर दंगे की 13वीं बरसी पर उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर 2013 की घटनाओं की चर्चा तेज हो गई है। लखनऊ, मुजफ्फरनगर, अलीगढ़, सहारनपुर और शामली समेत कई शहरों में लगाए गए पोस्टरों ने राजनीतिक माहौल गरमा दिया। पोस्टरों पर लिखा था- ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे, मुजफ्फरनगर दंगा।’
हालांकि कई जगह प्रशासन ने इन पोस्टरों को हटवा दिया, लेकिन तब तक उनकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल चुके थे। अब पुलिस अलग-अलग इलाकों में लगे पोस्टरों के पीछे कौन लोग हैं, इसकी जानकारी जुटा रही है। सीसीटीवी फुटेज और अन्य सुरागों के आधार पर पोस्टर लगाने वालों की पहचान की कोशिश की जा रही है।
मुजफ्फरनगर में हिंसा की शुरुआत सितंबर 2013 में हुई थी। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, दंगों में 60 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी, जबकि 50 हजार से अधिक लोग विस्थापित हुए थे। हालात इतने बिगड़ गए थे कि हिंसा पर काबू पाने के लिए सेना की मदद लेनी पड़ी थी। उस वक्त उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी की सरकार थी। दंगों को लेकर तत्कालीन सरकार की कानून-व्यवस्था पर विपक्ष ने जमकर सवाल उठाए थे। सपा सरकार पर हिंसा रोकने में नाकाम रहने और दंगाइयों के प्रति नरमी बरतने जैसे आरोप भी लगाए गए थे। अखिलेश यादव के सैफई महोत्सव में शामिल होने को लेकर भी उस समय विपक्ष ने राजनीतिक हमला बोला था। यही वजह है कि 13 साल बाद दंगे की बरसी पर सामने आए पोस्टरों को महज पुरानी घटना की याद के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इन्हें यूपी की मौजूदा सियासत से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
पोस्टरों के सामने आने के बाद समाजवादी पार्टी ने सत्ता पक्ष पर निशाना साधा है। पार्टी की ओर से आरोप लगाया गया है कि इन पोस्टरों के पीछे सत्ता पक्ष से जुड़े लोगों की भूमिका हो सकती है। हालांकि, पोस्टर किसने लगाए और उनका मकसद क्या था, इसे लेकर अभी प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक अलग-अलग जिलों में सामने आए पोस्टरों की जानकारी जुटाई जा रही है। पुलिस सीसीटीवी फुटेज भी खंगाल रही है, ताकि यह पता चल सके कि पोस्टर लगाने वाले लोग कौन थे और क्या सभी जगहों पर पोस्टर लगाने के पीछे एक ही समूह की भूमिका थी।
मुजफ्फरनगर हिंसा की पृष्ठभूमि में 27 अगस्त 2013 को कवाल गांव में हुई घटनाओं को अहम माना जाता है। यहां शाहनवाज की हत्या के बाद सचिन और गौरव नाम के दो युवकों की हत्या ने इलाके में तनाव बढ़ा दिया था। इसके बाद पंचायतों और राजनीतिक बयानबाजी के बीच माहौल लगातार तनावपूर्ण होता गया। 31 अगस्त को खालापार और नंगला मंदौड़ में हुई पंचायतों के बाद स्थिति और संवेदनशील हो गई। 7 सितंबर को नंगला मंदौड़ में महापंचायत हुई। इसके बाद लौट रही भीड़ के दौरान कई जगहों पर विवाद, पथराव और हिंसा की घटनाएं सामने आईं। देखते ही देखते मुजफ्फरनगर और आसपास के इलाकों में हिंसा फैल गई। मीरापुर, भौराकलां, शाहपुर, तितावी, बुढ़ाना, फुगाना और भोपा समेत कई इलाकों में हालात बिगड़ गए।
2013 की हिंसा को 13 साल बीत चुके हैं। प्रभावित इलाकों में जिंदगी काफी हद तक सामान्य हो चुकी है, लेकिन जिन परिवारों ने अपने लोगों को खोया, उनके लिए वह दौर आज भी दर्दनाक याद है। हिंसा के बाद विस्थापित परिवारों के पुनर्वास और प्रभावित लोगों को सहायता देने के लिए तत्कालीन सरकार ने कई घोषणाएं की थीं। कुछ प्रभावित परिवारों के सदस्यों को सरकारी नौकरी भी दी गई। अब 13वीं बरसी पर लगे पोस्टरों ने एक बार फिर उस दौर को राजनीतिक बहस के बीच ला दिया है। एक तरफ पुलिस पोस्टरों के पीछे के लोगों की तलाश कर रही है, तो दूसरी तरफ सपा और सत्ता पक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। यानी 13 साल पुराना मुजफ्फरनगर दंगा एक बार फिर यूपी की राजनीति में नया मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है।
Updated on:
07 Sept 2026 01:44 pm
Published on:
07 Sept 2026 01:44 pm
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