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ईनाणा गांव में 468 साल पहले रचा गया सामूहिक विवाह का इतिहास

विक्रम संवत 1615 में अक्षय तृतीया पर 84 कन्याओं का कराया विवाह, आज भी ‘चंवरी के बास’ में जीवित है विरासत, कई समाजों की बेटियों का काठाबाबा ने किया था सामूहिक विवाह

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राव भंवरलाल

राव भंवरलाल

मूण्डवा (नागौर). राजस्थान की लोक परंपराओं और सामाजिक एकता की मिसाल बने ईनाणा गांव में करीब 468 वर्ष पहले ऐतिहासिक सामूहिक विवाह का आयोजन हुआ। उसकी ख्याती आज भी गांव की वंशावली और विरासत में सुनाई देती है। विक्रम संवत 1615 में अक्षय तृतीया के दिन गांव में 84 कन्याओं का सामूहिक विवाह कराया गया था। खास बात यह रही कि इन कन्याओं में कई समाजों की बेटियां शामिल थीं। काठाबाबा ने सामाजिक समरसता और भाईचारे का संदेश देते हुए यह सामूहित विवाह करवाया था।

‘चंवरी के बास’ से बनी मोहल्ले की पहचान

इस ऐतिहासिक आयोजन के बाद हमीर बाबा के बास की पहचान “चंवरी के बास” के नाम से होने लगी, जो आज भी कायम है। जहां विवाह की चंवरियां बनाई गई थीं, वहां ऐतिहासिक चबूतरा मौजूद है। इस चबूतरे में हवन के सर्वा, कलश और विवाह से जुड़ी सामग्री सुरक्षित रखी है। पहले यह चबूतरा जिप्सम से लीपा गया था, जिसे बाद में जीर्णोद्धार कर ग्रेनाइट पत्थरों से संरक्षित किया गया।

काठाबाबा की ग्यारहवीं पीढ़ी ने रचा इतिहास

ईनाणा गांव की स्थापना विक्रम संवत 1358 में शोभराजजी ने पंडित राधाकिशन ब्राह्मण के हाथों शिवलिंग स्थापना करवाई थी। उनकी ग्यारहवीं पीढ़ी में काठाबाबा हुए, जिन्होंने यह सामूहिक विवाह सम्पन्न करवाया। काठाबाबा के वंशज आज भी ‘काठावत’ के नाम से जाने जाते हैं। हाल ही में उनके करीब 50 परिवारों ने एक साथ बैठकर उसी ऐतिहासिक चबूतरे पर सामूहिक रूप से वंशावली सुनी और इतिहास की यादों को ताजा किया।

सामाजिक एकता और भाईचारे की मिसाल

वंशावली वाचन करने वाले राव भंवरलाल ने बताया कि काठाबाबा ने अपनी संतानों के साथ उस समय 84 विवाह योग्य कन्याओं का कन्यादान किया था। इनमें 40 भाणजियां, 10 भाइयों की बेटियां और अन्य समाजों की कन्याएं शामिल थीं। ब्राह्मण, नायक, कुम्हार और बहीभाट समाज की बेटियों का विवाह भी इसी दौरान कराया गया। यह आयोजन सामाजिक समरसता और सामूहिक सहयोग की अनूठी मिसाल माना जाता है।

इतिहास में दर्ज है ईनाणा की स्थापना

लोक इतिहास के अनुसार शोभराजजी ने संवत 1354 में जमासणियां ढाणी बसाई थी। बाद में उनके पुत्र इंदरसी के नाम पर विक्रम संवत 1358 में अक्षय तृतीया को ईनाणा गांव बसाया गया। गांव की स्थापना के साथ सात जातियों ने “ईनाणियां”गौत्र अपनाया, जो आज भी गांव की पहचान बना हुआ है।