8 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

catch_icon

प्लस

epaper_icon

ई-पेपर

profile_icon

प्रोफाइल

भागवत कथा श्रवण से जीव का कल्याण

रूण. भगवान ने जो लीला की वह सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए की हैं। भगवान खुद पालनहार हैं और हमारे को भी पालते हैं। यह विचार कथावाचक आचार्य राजकमल ने निकटवर्ती गांव भटनोखा में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन गुरुवार को कहे।

2 min read
Google source verification
nagaur

Bhagwat

उन्होंने आगे कहा कि इंसान को इंसान के काम आना चाहिए, चाहे वह कोई भी धर्म को मानने वाला हो, कोई भी इंसान किसी के सुख में शामिल हो या नहीं हो किंतु दुश्मन के दुख में भी हमें शामिल होकर उसका दुख जरूर बांटना चाहिए। यही सच्ची इंसानियत है ।आगे उन्होंने कहा कि जहां कहीं पर भी भागवत कथा होती हैं, वहां कुछ समय निकालकर कथा श्रवण करने से मनुष्य जीवन का कल्याण होता है। भगवान की लीला अपरंपार है उसका कोई बखान नहीं कर सकता ।इस मौके पर कृष्ण, सुदामा, राजा परीक्षित की सजीव झांकियां सजाई गई तथा मोक्ष ,कलयुग वार्ता और कथा विश्राम के बारे में बताया गया। अंतिम दिन भजन गायक राजू गोलियासनी ने उपस्थित श्रद्धालुओं को एक से बढकऱ एक संगीतमय भजनों की प्रस्तुतियां देकर मन मोह लिया ।इस मौके पर अंतिम दिन श्रीमद् भागवत कथा के समापन पर जुलूस के रूप में यजमानो ने भागवत कथा को सर पर रख कर स्थानीय मथुरेश नारायण मंदिर तक जुलूस के रूप में पहुंचाया। ओंकारसिंह राजपुरोहित ने बताया कि शुक्रवार को सुबह 8 बजे सें कथा स्थल पर हवन कार्यक्रम रखा गया है, जिसमें यजमान जोड़े भाग लेंगे।
धैर्य व संयम से टल जाता है बड़ा संकट - कथा में सुनाया सती चरित्र व धु्रव का प्रसंग खींवसर। हेसाबा गांव में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तीसरे दिन गुरुवार को कथा वाचक संत सियाराम महाराज ने कहा कि किसी भी स्थान पर जाने से पहले इस बात का ध्यान जरूर रखना चाहिए कि जहां आप जा रहे है वहां आपके इष्ट, गुरु या माता-पिता का अपमान तो नहीं हुआ, अगर ऐसा है तो वहां नहीं जाना चाहिए। इस दौरान सती चरित्र के प्रसंग की कथा सुनाई। महाराज ने धु्रव चरित्र की कथा को सुनाते हुए समझाया कि ध्रुव की सौतेली मां सुरुचि द्वारा अपमानित होने पर भी उसकी मां सुनीति ने धैर्य नहीं खोया जिससे एक बहुत बड़ा संकट टल गया। परिवार को बचाए रखने के लिए धैर्य व संयम की नितांत आवश्यकता रहती है। भक्ति करने की कोई उम्र नहीं होती। भक्ति को बचपन में ही करने की प्रेरणा देनी चाहिए, क्योंकि बचपन कच्चे मिट्टी की तरह होता है उसे जैसा चाहे वैसा पात्र बनाया जा सकता है।