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जेएलएन अस्पताल के डॉ. लोमरोड़ के निलम्बन आदेश पर हाईकोर्ट ने लगाया स्टे

एमसीएच विंग में गर्भवती की मौत का मामला, डॉ. लोमरोड़ के खिलाफ की गई कार्रवाई को लेकर उठ रहे सवाल

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Jln hospital

नागौर. जिला मुख्यालय के जेएलएन राजकीय चिकित्सालय के एमसीएच विंग में गत दिनों हुई गर्भवती महिला की मौत के बाद निलम्बित किए गए डॉ. शैलेन्द्रलोमरोड़ को हाईकोर्ट ने राहत दी है। निलम्बन आदेश के विरुद्ध डॉ. लोमरोड़ ने एडवोकेट यशपाल खिलेरी के माध्यम से रिट याचिका पेश कर चुनौती दी, जिस पर हाईकोर्ट के न्यायधीश अरुण मोंगा ने निलम्बन आदेश पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई 14 अगस्त को होगी।

गौरतलब है कि 10 मई की रात को गर्भवती सरिता की इलाज के दौरान मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन पर उपचार में लापरवाही बरतने का आरोप लगाते हुए मोर्चरी के बाहर धरना दे दिया था, जिसके बाद अस्पताल प्रबंधन ने आनन-फानन में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. शैलेन्द्रलोमरोड़ को निलम्बित कर दिया, जबकि एक रेजिडेंट डॉ. को एपीओ कर दिया था।

लोमरोड़ को नहीं भेजा गया कॉल

जेएलएन अस्पताल के एमसीएच विंग में कार्यरत वरिष्ठ महिला रोग चिकित्सक डॉ. शैलेन्द्रलोमरोड़ की ओर से अधिवक्ता यशपाल खिलेरी ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर बताया कि डॉ. लोमरोड़ गत 14 वर्ष से चिकित्साधिकारी के पद पर सेवारत है। गत 10 मई की रात्रि में नाइट ऑफ (रात्रि अवकाश) के दौरान ऑन कॉल ड्यूटी पर होने के कारण अस्पताल के पीएमओ ने उन्हें इस कारण निलंबित कर दिया कि इलाज के दौरान प्रसूता की मृत्यु हो गई। जबकि मरीज की मृत्यु होने के समय वे ना तो ड्यूटी पर थे और ना ही उन्हें नियमानुसार कॉल कर अस्पताल बुलाया गया, जबकि ऑन कॉल डॉक्टर को कॉल के तहत एम्बुलेंस भेजी जाती है। अस्पताल के रिकॉर्ड में ऐसा कहीं दर्ज नहीं है। वहीं दूसरी ओर रात्रिकालीन ड्यूटी पर जो कैजुअल्टी मेडिकल ऑफिसर थे, उनको भी मरीज के बारे में सूचना नहीं दी गई। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी प्रसूता के फेफड़ों में पानी भरा होने की पुष्टि हुई है।

पीएमओ नहीं कर सकते निलम्बित

याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट में बताया गया कि नियमानुसार चिकित्सा अधिकारी राज्य सेवा के अधिकारी होते हैं, जिनकी नियुक्ति राज्य सरकार और चिकित्सा विभाग के सचिव की ओर से होती हैं और प्रारंभिक जांच में सुनवाई के अवसर देने के बाद प्रथम दृष्टया दोषी होने पर कार्मिक विभाग ही अनुशासनात्मक कार्रवाई संस्थित कर सकता है, लेकिन निलंबन करने के लिए जिला अस्पताल के प्रमुख चिकित्सा अधिकारी के पास कोई अधिकारिता और क्षेत्राधिकार नहीं है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इन्तजार किए बिना व उसके रात्रि ड्यूटी पर नहीं होने के बावजूद भी उन्हें बेवजह निलंबित किया गया है। मामले की प्रारंभिक सुनवाई करते हुए जस्टिस अरुण मोंगा ने 11 मई के निलंबन आदेश पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार सहित अन्य से जवाब तलब किया। अगली सुनवाई 14 अगस्त को होगी।