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भारतीय संस्कृृति ही कर सकती है विश्व कल्याण

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का परिवार प्रबोधन कार्यक्रम कस्बे के चार भुजा मंदिर में हुआ।

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भारतीय संस्कृृति ही कर सकती है विश्व कल्याण

लाडनूं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का परिवार प्रबोधन कार्यक्रम कस्बे के चार भुजा मंदिर में हुआ। मुख्य वक्ता संघ के राजस्थान क्षेत्रीय कार्यकारीणी के सदस्य नंदलाल जोशी ने कहा कि वर्तमान समय में संयुक्त परिवार तेजी से टूटकर एकल परिवारों में बदल रहे। एकल परिवार आर्थिक रूप से सम्पन्न होता है लेकिन इसमें सहनशीलता, परस्पर सहयोग व संस्कारों की कमी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। इसके चलते परिवार का प्रत्येक सदस्य चिंता से ग्रस्त हो रहा है। उन्होंने कहा कि इस आधुनिकता को अपनाने के बाद परिवार में छोटी-छोटी बातों को लेकर बड़े-बड़े झगड़े होते है जो कोर्ट तक पंहुच जाते हैं। इस आधुनिकता में परिवारों में आपसी मनमुटाव,ईष्र्या, अनुचित प्रतियोगिता बढ़़ रही है जो संस्कृृति को विनाश की ओर ले जाती है। हमारी प्राचीन ऋषि मुनियों की संस्कृति तो हमे वसुदेव कुटुम्बकम की शिक्षा देती है। अर्थात् पूरी पृृथ्वी व इसमें रहने वाले सभी प्राणी, जानवर व वनस्पति परिवार के विभिन्न अंग है। इनके साथ मिलजुलकर रहना सिखाती है। हमे अपने घरों में बच्चों को अच्छे संस्कार माता-पिता के चरण स्पर्श, पूजा पाठ करवाना, बडों का सम्मान, अपने कार्य के प्रति निष्ठा, समाज व देश सेवा की प्रतिदिन शिक्षा देनी चाहिए। उन्होंने बताया कि हम आधुनिकता की होड़ में पश्चिमी संस्कृृति अपना रहे है और अपनी प्राचीन संस्कृृति को भूल रहे है। जबकि विदेशी लोग हमारी भारतीय संस्कृृति के प्रति आकर्षित हो रहे है। भारत की अनेक संस्थाएं भारत से बाहर विदेशों में मंदिर निर्माण, सत्संग व धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन करती है। जिसमें विदेशी लोग बडी़ उत्सुकता से भाग लेते है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति ही विश्व का कल्याण कर सकती है। कार्यक्रम में १00 परिवारों से 500 पुरुष व मातृशक्ति ने भाग लिया।

विवेकानन्द के आदर्शों को अपनाने का आह्वान

लाडनूं. निम्बीजोधा स्थित राजकीय आदर्श सीसै स्कूल में स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती कॅरियर डे के रूप में मनाईगई। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रधानाचार्य ज्ञानसिंह ने की। इस दौरान हुई विभिन्न प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों ने उत्साह से हिस्सा लिया। इस मौके पर प्रभारी सुनीता, दुष्यंत कुमार त्यागी, जगदीश प्रसाद घिंटाला आदि ने विवेकानन्द के आदर्शों को जीवन में अपनाने का आह्वान किया।प्रधानाचार्य ज्ञानसिंह ने प्रतियोगिता के विजेताओं को गणतंत्र दिवस पर पुरस्कृत करने की घोषणा की।